बुधवार, 24 जून 2026

अनंत की खोज...💐💐💐


जीवन क्या है... यह प्रश्न जितना पुराना है, उतना ही नया भी। मनुष्य जन्म लेता है, बढ़ता है, सपने देखता है, प्रेम करता है, संघर्ष करता है और एक दिन इस संसार से चला जाता है। इस छोटी सी यात्रा में वह न जाने कितनी चीजों को अपना मान लेता है। यह मेरा घर है, मेरा परिवार है, मेरा धन है, मेरी पहचान है। लेकिन समय धीरे धीरे उसके हाथों से सब कुछ छीन लेता है और अंत में वह खाली हाथ ही चला जाता है।

तब मन में एक प्रश्न उठता है, यदि सब कुछ यहीं छूट जाना है, तो वास्तव में हमारा है क्या?
संतों और ऋषियों ने कहा कि यह संसार एक स्वप्न के समान है। जो आज सत्य प्रतीत होता है, वह कल स्मृति बन जाता है। जो आज अपना लगता है, वह कल पराया हो जाता है। यह जगत परिवर्तनशील है, इसलिए इसे अंतिम सत्य नहीं कहा जा सकता। पर इसका अर्थ यह भी नहीं कि जीवन निरर्थक है। यदि संसार क्षणभंगुर है, तो इसी क्षणभंगुरता के भीतर किसी शाश्वत तत्व की खोज करना ही मनुष्य जीवन का उद्देश्य है।

क्या वह अत्यंत सुंदर होगा, क्या वह भयंकर डरावना होगा अथवा हमारी कल्पनाओं से भी परे होगा? इन प्रश्नों का उत्तर किसी पुस्तक में नहीं मिलता। उत्तर केवल अनुभव में मिलता है। यही कारण है कि सच्चा साधक केवल मान्यताओं से संतुष्ट नहीं होता। वह जानना चाहता है। वह देखना चाहता है। वह अनुभव करना चाहता है। उसके भीतर एक प्यास जन्म लेती है। यह प्यास धन की नहीं होती, सम्मान की नहीं होती, बल्कि सत्य की होती है।

ध्यान उसी प्यास का नाम है। सुमिरन उसी पुकार का नाम है। प्रार्थना उसी प्रेम का नाम है। जब मनुष्य कुछ क्षणों के लिए संसार के शोर से दूर होकर अपने भीतर उतरता है, तब उसे अनुभव होने लगता है कि जिस परमात्मा को वह बाहर खोज रहा था, उसकी झलक तो भीतर भी मौजूद है। मन की गहराइयों में एक मौन है। उस मौन में एक अदृश्य उपस्थिति है। वही उपस्थिति जीवन को धारण किए हुए है।

परमात्मा की खोज किसी स्थान की यात्रा नहीं है यह भीतर की यात्रा है। यह यात्रा अनंत की ओर है। यह यात्रा स्वयं को खोकर स्वयं को पाने की यात्रा है। जैसे नदी समुद्र की ओर बहती है, वैसे ही आत्मा भी अपने स्रोत की ओर लौटना चाहती है। इसी कारण संसार की सभी उपलब्धियों के बाद भी मनुष्य के भीतर एक रिक्तता बनी रहती है। धन मिल जाता है, परिवार मिल जाता है, प्रेम मिल जाता है, सम्मान मिल जाता है, फिर भी कहीं न कहीं लगता है कि कुछ अभी शेष है।
वह जो शेष है, वही परमात्मा की पुकार है।
वही अनंत की स्मृति है।

वही उस मूल घर की याद है, जहाँ से हम आए हैं।
यदि परमात्मा ने हमें चेतना दी है, विवेक दिया है, प्रश्न करने की क्षमता दी है, तो निश्चय ही उसने हमें खोज के लिए ही भेजा है। केवल जन्म लेना, भोजन करना, संघर्ष करना और एक दिन आँखें बंद कर लेना ही मनुष्य जीवन का उद्देश्य नहीं हो सकता।

मनुष्य का वास्तविक सौभाग्य तब आरंभ होता है, जब उसके भीतर यह प्रश्न जागता है:-
मैं कौन हूँ?
मैं कहाँ से आया हूँ?
और मुझे कहाँ लौटना है?
जिस दिन यह प्रश्न हृदय में अग्नि बनकर जलने लगते हैं, उसी दिन आध्यात्मिक यात्रा आरंभ हो जाती है।

✍️ Lekhraj Sahu ❤️

गुरुवार, 11 जून 2026

पहला प्यार 💕

सब्ज़ियों की एक छोटी सी बाड़ी थीवहीं मिट्टी की सोंधी खुशबू, हरी पत्तियों की सरसराहट और धड़कते हुए दिलों के बीच उसने मुझे बुलाया था और एक प्रेम पत्र दिया था। उस पल में जैसे पूरा संसार ठहर गया था। शब्द तो उस कागज़ पर लिखे थे, लेकिन उन्हें पढ़ने से पहले ही उसकी झुकी हुई नज़रें और काँपती हुई मुस्कान सब कुछ कह चुकी थीं।

फिर एक ऐसा क्षण आया, जो समय की धूल में दबकर भी कभी धुंधला नहीं पड़ा। उसने धीरे से मेरे गाल पर एक चुंबन किया और अपने घर की ओर भाग गई, और वह पल मेरी स्मृतियों में हमेशा के लिए ठहर गया। उस उम्र में वह क्षण किसी अनमोल ख़ज़ाने से कम नहीं था। धड़कनें तेज़ हो गई थीं, शब्द जैसे कहीं खो गए थे, और मन एक अजीब सी खुशी से भर उठा था।

उसके घर के पास एक तालाब था। तालाब के पानी पर पुरइन के गोल, चौड़े हरे पत्ते तैरते रहते थे और उनके बीच खिले गुलाबी कमल के फूल मानो किसी प्रेम कहानी के मौन साक्षी हों। सुबह की पहली किरण जब उन कमलों पर पड़ती थी, तो पूरा तालाब सोने सा चमक उठता था। शाम को ढलते सूरज की लालिमा उन पुरइन के पत्तों और कमल के फूलों पर बिखर जाती थी, और ऐसा लगता था मानो प्रकृति स्वयं प्रेम का कोई गीत गुनगुना रही हो।

तालाब के किनारे खड़े नीम और पीपल के पेड़ अपनी घनी छाँव फैलाए रहते थे। उनकी पत्तियों से गुजरती हवा में एक अजीब सी मिठास थी। उन्हीं रास्तों पर चलते हुए, उन्हीं पेड़ों की छाँव में खड़े होकर, न जाने कितनी बार मैंने उसकी एक झलक पाने की प्रतीक्षा की थी।

आज इतने वर्षों बाद भी जब उस बाड़ी, उस तालाब, पुरइन के पत्तों, गुलाबी कमलों, नीम और पीपल की छाँव को याद करता हूँ, तो वह मासूम सा प्रेम भी यादों के आँगन में उतर आता है। लगता है जैसे समय बहुत आगे बढ़ गया हो, पर मन का एक कोना अब भी वहीं ठहरा हुआ है... उसी प्रेम पत्र के पास... उसी मुस्कान के पास... और उसी पहले चुंबन के पास।

कुछ प्रेम कहानियाँ पूरी नहीं होतीं, फिर भी अधूरी नहीं कहलातीं। वे जीवन के किसी शांत तालाब में खिले कमल की तरह होती हैं... जिनकी सुंदरता समय बीत जाने के बाद भी स्मृतियों के जल में सदा खिली रहती है।

✍️ Lekhraj Sahu ❤️

शुक्रवार, 22 मई 2026

मेरी बेटियाँ... मेरे घर की धड़कनें 💕


गर्मियों की छुट्टियाँ आते ही घर का रंग कुछ बदल जाता है। बच्चों की आँखों में नानी के घर जाने की चमक उतर आती है। मामा-मामी, गाँव की गलियाँ, आम के पेड़, नानी के हाथ का खाना... इन सबका आकर्षण उन्हें अपनी ओर खींच लेता है। पत्नी भी कुछ दिनों के लिए अपने माँ-पापा, भाई-भाभी और अपनों से मिलने चली जाती है। यह स्वाभाविक है... होना भी चाहिए। पर उनके जाने के बाद इस घर में जो सन्नाटा उतरता है, उसे शब्दों में कहना आसान नहीं।


मैं यहाँ रायपुर में अकेला रह जाता हूँ... पर सच कहूँ तो मेरा मन भी वहीं उनके पास ही भटकता रहता है। मेरा घर तो मेरी दोनों बेटियों की हँसी से आबाद रहता है। उनकी मीठी बातें पूरे दिन घर-आँगन में ऐसे गूँजती रहती हैं, जैसे किसी मंदिर में सुबह की घंटियाँ। शाम को जब ऑफिस से लौटता हूँ, तो दरवाज़े पर दो जोड़ी चमकती आँखें मेरा इंतज़ार करती मिलती हैं। उन आँखों में कितनी उम्मीदें होती हैं... पापा आज क्या लाए होंगे... चॉकलेट... कुरकुरे... चिप्स... या हमारी पसंद की कोई छोटी-सी चीज़...और मैं हर दिन उनके उस इंतज़ार में अपना संसार देखता हूँ।

मेरी बेटियाँ कुछ अलग हैं... बहुत अलग। वे केवल मेरी बेटियाँ नहीं, मेरे दिन भर की थकान का मरहम हैं। कभी मैं थका-हारा बैठा होता हूँ, तो उनके छोटे-छोटे, कोमल हाथ मेरे सिर पर आ जाते हैं। वे अपने नन्हे हाथों से जैसे कोई जादू करती हैं... धीरे-धीरे सिर दबाती हैं, और फिर प्यार से मेरा माथा चूम लेती हैं। उस एक क्षण में दिन भर की सारी थकान जाने कहाँ खो जाती है।
कभी पूछती हैं... "पापा, दवाई खा ली क्या?"
"पापा, तबियत अब ठीक है न?" उनकी यह चिंता देखकर मन भीतर तक भीग जाता है। सोचता हूँ... ये छोटी-सी जानें इतना स्नेह कहाँ से ले आती हैं?

दिन भर घर में उनका अपना एक अलग संसार चलता है। कभी नाचना, कभी गुनगुनाना, कभी कपड़े बदल-बदलकर आईने के सामने इठलाना, कभी खुद को राजकुमारी समझना, कभी माँ की चूड़ियाँ पहन लेना... और फिर खिलखिलाकर हँस देना।

मेरी बड़ी बिटिया चित्रा अब 9वीं कक्षा में है, बहुत समझदार, बहुत गंभीर, हमेशा मर्यादित, भावनाओं की गहराई को समझने वाली... छोटी बिटिया आराध्या अपने नाम की तरह ही पूजा-सी निर्मल, थोड़ी शरारती, थोड़ी जिद्दी। दोनों के बीच छोटी-छोटी लड़ाइयाँ भी होती हैं... कभी खिलौने को लेकर, कभी रिमोट को लेकर, कभी बिना वजह ही। फिर उनकी मम्मी वर्षा बीच में आती हैं... प्यार से समझाती हैं, कभी डाँटती हैं, कभी खुद हँस पड़ती हैं। और मैं... मैं चुपचाप यह सब देखता रहता हूँ।

हाँ... मैं चुपके से सब देखता हूँ। उन्हें हर दिन थोड़ा-थोड़ा बड़ा होते देखता हूँ। उनकी बदलती बातें, बदलती पसंद, उनकी बढ़ती समझ... सब देखता हूँ। और हर दिन भीतर कहीं एक अजीब-सी कसक भी उठती है... कि ये नन्हे पल कितनी जल्दी बीत जाएँगे। कभी-कभी रात को लगता है, जीवन में यदि कुछ सचमुच ईश्वर का दिया हुआ सबसे सुंदर उपहार है, तो वह बच्चों की हँसी है। माता-पिता होना केवल जिम्मेदारी नहीं... यह तो ईश्वर द्वारा सौंपा गया प्रेम का सबसे पवित्र रूप है।

आज जब वे घर में नहीं हैं, तो यह मकान सिर्फ दीवारों का ढाँचा लगता है। न वह शोर है, न वह खिलखिलाहट, न वह "पापा आ गए" की पुकार और तब समझ आता है... घर ईंट-पत्थरों से नहीं बनता... घर उन नन्हे कदमों की आहट से बनता है, उन छोटी हथेलियों के स्पर्श से बनता है, पत्नी के मौन स्नेह से बनता है।

एक दिन लौट आना है अपनी मिट्टी में...💕

चिड़िया को देखता हूँ तो लगता है, प्रकृति ने जीवन का सबसे बड़ा सत्य उसके छोटे से हृदय में छुपा रखा है। वह सुबह अपने घोंसले से उड़ जाती है... न उसे कड़ी धूप की परवाह होती है, न बरसते बादलों की, न मीलों की दूरियों का भय। उसकी छोटी-सी चोंच में केवल एक संकल्प होता है... अपने बच्चों के लिए दाना जुटाना। पर जैसे ही सांझ उतरती है, आकाश पर लौटते पंछियों की कतारें बनती हैं, वह भी अपने घोंसले की ओर लौट पड़ती है... अपनी नन्ही संतानों के पास, अपने घर, अपने अपनापन के पास।

शायद मनुष्य भी कुछ ऐसा ही है... बस अंतर इतना है कि चिड़िया हर शाम लौट आती है, और मनुष्य लौटने की इच्छा को वर्षों तक अपने भीतर दबाए जीता रहता है।

हम भी तो अपने गाँव, अपने घर, अपनी जन्मभूमि, अपने माँ-बाबूजी, भाई-बहनों, बचपन के दोस्तों को छोड़कर निकल पड़ते हैं... किसी दूसरे शहर, किसी अनजान दुनिया में... केवल इस आशा में कि आने वाली पीढ़ियों का भविष्य उज्ज्वल हो। दिन भर काम की दौड़, जिम्मेदारियों का बोझ, और रात को थके हुए मन में अचानक किसी पुराने आँगन की याद उतर आती है। मिट्टी की वह सोंधी महक, खेतों में लहराती हरी फसलें, तालाब के शांत पानी पर डूबता सूरज, नीम और पीपल की ठंडी छाँव... सब स्मृतियों में आकर मन को भिगो जाते हैं।

याद आता है वह बचपन, जब स्वच्छ चाँदनी रातों में आँगन में सबके बिस्तर बिछते थे। दादा जी आसमान के तारों को दिखाकर कहानियाँ सुनाते थे। दादी माँ की गोद में सिर रखते ही जैसे सारी दुनिया का भय समाप्त हो जाता था। नाना-नानी के किस्सों में राजकुमार होते थे, परियों के महल होते थे, और हम उन कहानियों में खोकर कब नींद की बाहों में चले जाते थे, पता ही नहीं चलता था।

आज बड़े शहरों की ऊँची इमारतों में खिड़की से झाँकता हूँ तो आकाश भी अधूरा लगता है। वहाँ चाँद तो है, पर वैसी आत्मीयता नहीं। हवा तो है, पर उसमें अपनी मिट्टी की खुशबू नहीं। लोग तो हैं, पर अपनेपन की वह गर्माहट नहीं। यहाँ जीवन चलता तो है... पर कई बार लगता है जैसे हम जी नहीं रहे, बस निभा रहे हैं।

कभी-कभी मन बहुत प्यासा हो उठता है... उस आवाज़ के लिए, जो माँ रसोई से पुकारती थी। उस स्पर्श के लिए, जिसमें बाबूजी का मौन स्नेह छुपा होता था। उस हँसी के लिए, जो भाइयों के साथ बेवजह गूँजती थी। उन दोस्तों के लिए, जिनके साथ नंगे पाँव खेतों की मेड़ों पर दौड़ना ही सबसे बड़ा सुख था।

जीवन सचमुच एक खानाबदोश यात्रा जैसा लगता है। हम कहाँ से निकले थे... कहाँ पहुँचना था... और कहाँ भटक गए... यह किसी को नहीं मालूम। बस चलते जाते हैं, जिम्मेदारियों की गठरी कंधों पर उठाए हुए। और फिर एक दिन खबर आती है... कोई लौट आया... लेकिन अपने पैरों से नहीं... चार कंधों पर।

यह सोचकर हृदय काँप उठता है... क्या सचमुच मनुष्य अपनी जन्मभूमि में लौटता ही तब है, जब उसकी साँसें साथ छोड़ चुकी होती हैं? नहीं... मन कहता है, इससे पहले लौटना चाहिए। एक बार फिर उस मिट्टी को माथे से लगाना चाहिए, जहाँ पहला कदम रखा था। उस नीम के पेड़ को छूना चाहिए, जिसने बचपन की धूप से बचाया था। उस तालाब के किनारे बैठना चाहिए, जहाँ सपने पहली बार पानी में अपना चेहरा देखते थे। उस आँगन में फिर लेटना चाहिए, जहाँ चाँदनी बिना बुलाए उतर आती थी।

एक दिन मुझे भी लौट आना है... अपनी मिट्टी में... अपने दादा-दादी की स्मृतियों की गोद में... अपने नन्हे दोस्तों की हँसी के पास... उस गाँव की पगडंडियों पर, जहाँ मेरा बचपन अब भी शायद मेरा इंतज़ार कर रहा है। क्योंकि अंत में मनुष्य कहीं और का नहीं होता... वह अपनी मिट्टी का ही होता है... हमेशा...।

प्रेम जो जोड़ता है, तोड़ता नहीं 💕

वह रात जो लौटकर न आई 💕


मंगलवार, 12 मई 2026

मोगरे के वो सूखे फूल 💕

टूटा हुआ दिल हमेशा शोर नहीं करता। वह हर बार आँसुओं में नहीं बहता, न ही हर बार दुनिया को अपनी पीड़ा दिखाता है। कभी-कभी टूटन इतनी गहरी होती है कि वह शब्दों के पार चली जाती है और केवल एक गहरा मौन छोड़ जाती है। ऐसा मौन, जो बाहर से शांत दिखता है, लेकिन भीतर लगातार चीखता रहता है।

जब कोई अपना बिछड़ता है, तो दुख केवल उसके चले जाने का नहीं होता, दुख उस खालीपन का होता है जो उसके जाने के बाद हमारे भीतर स्थायी घर बना लेता है। कुछ लोग जीवन से जाते नहीं, वे बस हमारे दिनों से हट जाते हैं, लेकिन स्मृतियों से नहीं। उनकी यादें सांसों में घुल जाती हैं। उन्हें भूलने की कोशिश वैसी ही होती है जैसे खुद के किसी हिस्से को मिटाने की कोशिश करना।

टूटे दिल का सबसे कठिन पक्ष यह है कि वह धीरे-धीरे इंसान को बदल देता है। पहले जो व्यक्ति छोटी-छोटी बातों में मुस्कुरा देता था, वह अब मुस्कुराता तो है, लेकिन भीतर वह मुस्कान कहीं जन्म ही नहीं लेती। बाहर की हँसी और भीतर के सन्नाटे के बीच एक लंबी दूरी बन जाती है। लोग समझते हैं कि सब सामान्य है, लेकिन सच यह होता है कि भीतर एक पूरा संसार खंडहर बन चुका होता है।

कभी-कभी ऐसा लगता है कि दिल टूटना कोई एक घटना नहीं, बल्कि एक लंबी प्रक्रिया है। हर दिन कुछ उम्मीदें मरती हैं, हर रात कुछ स्मृतियाँ और गहरी हो जाती हैं। इंसान जीता रहता है, काम करता है, लोगों से मिलता है, लेकिन भीतर एक कमरा हमेशा बंद रहता है, जहाँ केवल दर्द रहता है और उन अधूरे शब्दों की गूँज, जो कभी कहे नहीं जा सके।

सबसे गहरा दर्द यह है कि हमारे पास आज भी कहने के लिए बहुत कुछ होता है, लेकिन सुनने वाला वही नहीं होता। समय घावों पर परत तो चढ़ा देता है, पर कुछ घाव पूरी तरह भरते नहीं। वे बस हमारे स्वभाव का हिस्सा बन जाते हैं।

टूटा हुआ दिल प्रेम से नफ़रत करना नहीं सिखाता; वह प्रेम की कीमत समझाता है। वह सिखाता है कि हर प्रेम का अंत मिलन नहीं होता। कुछ प्रेम केवल स्मृति बनकर जीते हैं, कुछ दर्द बनकर साथ चलते हैं, और कुछ मौन बनकर आत्मा में बस जाते हैं।

शायद टूटे हुए लोग पूरी तरह कभी पहले जैसे नहीं होते। वे फिर से जीना सीख लेते हैं, मुस्कुराना भी सीख लेते हैं, लेकिन उनके भीतर कहीं एक शांत उदासी हमेशा जीवित रहती है। टूटे दिल की यही सबसे बड़ी सच्चाई है। वह बाहर से शांत दिखता है, पर भीतर बहुत कुछ हमेशा के लिए बदल चुका होता है।

वो अधूरी कहानी 💕

कुछ प्रेम कहानियाँ पूरी होकर भी अधूरी रह जाती हैं, और कुछ अधूरी होकर भी जीवन भर पूरी लगती हैं। मेरा प्यार भी कुछ ऐसा ही था, न पूरी तरह मेरा, न पूरी तरह मुझसे दूर। वह जैसे किसी संध्या की आख़िरी किरण थी, जो आँखों से ओझल हो जाती है, पर मन के आकाश में देर तक चमकती रहती है।

वह मेरे जीवन में ऐसे आई थी जैसे सूखी धरती पर पहली बारिश की खुशबू उतरती है। बिना शोर, बिना घोषणा, बस चुपचाप। उसके आने से मेरे भीतर का सूना आँगन बोलने लगा था। हवा में एक नई मिठास थी, रास्ते छोटे लगने लगे थे, और इंतज़ार भी किसी उत्सव जैसा लगने लगा था।
प्रेम में सबसे सुंदर बात यह नहीं होती कि कोई आपके साथ है, सबसे सुंदर यह होता है कि किसी के होने से आप अपने भीतर बेहतर हो जाते हैं। उसके साथ मैं खुद को अधिक सच्चा, अधिक कोमल, अधिक जीवित महसूस करता था। उसकी हँसी मेरे दिन की शुरुआत थी और उसकी खामोशी मेरे मन की बेचैनी।

लेकिन शायद हर कहानी को मंज़िल नहीं मिलती। कुछ रिश्ते समय के हाथों छूट जाते हैं, कुछ परिस्थितियों के सामने हार जाते हैं, और कुछ लोग एक दूसरे से प्रेम करते हुए भी एक दूसरे के नहीं हो पाते।

मेरा अधूरा प्यार कोई शिकायत नहीं है। वह एक ऐसी प्रार्थना है जो पूरी न होकर भी पवित्र है। उसने मुझे टूटना सिखाया, और टूटकर भी प्रेम करना सिखाया। उसने यह समझाया कि प्रेम हमेशा पाने का नाम नहीं होता; कभी कभी प्रेम छोड़ देने में भी उतना ही सच्चा होता है।

आज भी जब किसी शाम हवा में मिट्टी की खुशबू आती है, जब कोई पुराना गीत अनायास कानों में उतरता है, या जब चाँद कुछ ज्यादा उदास लगता है, तो उसका ख़याल चुपचाप मेरे पास आ बैठता है। अब दर्द पहले जैसा तीखा नहीं रहा, लेकिन उसकी स्मृति एक धीमी आँच की तरह अब भी भीतर जलती है।

अधूरा प्रेम शायद इसलिए इतना गहरा होता है क्योंकि उसमें “क्या होता अगर…” का एक अनंत प्रश्न छिपा रहता है। जो मिल जाता है, वह जीवन का हिस्सा बन जाता है; जो नहीं मिलता, वह आत्मा का हिस्सा बन जाता है।

मेरा अधूरा प्यार अब मेरी कमी नहीं, मेरी संवेदना है। वह मेरे भीतर एक शांत नदी की तरह बहता है, बिना शोर, बिना मांग, बस अस्तित्व के साथ।
शायद कुछ प्रेम कहानियाँ साथ चलने के लिए नहीं, भीतर हमेशा जीवित रहने के लिए होती हैं।

रविवार, 3 मई 2026

अधूरी कहानी 💕

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कुछ प्रेम कहानियाँ गलतियों से नहीं टूटतीं, वे बस समय, परिस्थितियों और अधूरे भाग्य के बीच कहीं खो जाती हैं। मेरा प्रेम भी वैसा ही था। न उसने धोखा दिया, न मैंने बेवफाई की। फिर भी हमारे बीच एक ऐसी दूरी आ गई, जिसे कोई शब्द, कोई प्रतीक्षा, कोई आँसू मिटा नहीं सके। कभी-कभी मैं सोचता हूँ अगर गलती किसी की होती, तो शायद शिकायत करके दिल हल्का कर लेता। लेकिन यहाँ तो दोषी कोई नहीं था। बस हालात हमसे ज्यादा मजबूत निकले। उसकी याद आज भी मेरे दिनों में चुपचाप उतर आती है। कोई गीत सुनता हूँ, तो उसकी आवाज़ महसूस होती है। भीड़ में भी एक खालीपन मेरे साथ चलता है। ऐसा लगता है जैसे दिल का कोई हिस्सा उसी के पास रह गया हो। सबसे ज्यादा दर्द इस बात का नहीं कि वह अब मेरे साथ नहीं है, दर्द इस बात का है कि हम दोनों शायद साथ रहना चाहते थे, लेकिन जिंदगी ने हमें साथ रहने का अधिकार ही नहीं दिया। मैं उसे आज भी बुरा नहीं कह सकता। उसकी मासूमियत, उसकी मजबूरियाँ, उसका मौन, सब समझ आता है। और शायद यही समझ सबसे ज्यादा तकलीफ देती है। क्योंकि जब प्रेम में कोई अपराधी नहीं होता, तब सजा दोनों को उम्र भर मिलती है। अब मैं मुस्कुरा तो लेता हूँ, लोगों से बातें भी कर लेता हूँ, लेकिन भीतर कहीं एक टूटा हुआ कोना हमेशा चुप रहता है। वह प्रेम अधूरा जरूर रह गया, लेकिन झूठा कभी नहीं था।

💕

शनिवार, 2 मई 2026

कहीं तुम आस पास ही हो 💕

तुमसे बिछड़ने के बाद समझ आया कि दर्द भी आवाज़ करता है…बस उसे सुनने वाला कोई नहीं होता। जब मैं खुद में होता हूँ, तो एक अजीब खालीपन मेरे भीतर गूंजता है क्योंकि अब वहाँ तुम नहीं हो। पहले मेरा “मैं” तुम्हारे होने से पूरा था, अब वही “मैं” अधूरा, टूटा और बिखरा हुआ है।
उस तालाब के किनारे अब भी जाता हूँ…नीम और पीपल की छाँव में बैठता हूँ, पर अब वो छाँव सुकून नहीं देती बस तुम्हारी कमी और गहरी कर देती है। मिट्टी की खुशबू भी अब चुभती है, क्योंकि उसमें तुम्हारी यादें घुली हैं, और हर याद एक टीस बनकर दिल में उतर जाती है। 

गाँव की गलियाँ…
जहाँ कभी तुम्हारे साथ हँसते हुए चला था, आज वहीं से गुजरता हूँ तो लगता है जैसे हर दीवार मुझसे पूछ रही हो-वो कहाँ है…? गौरैया अब भी चहकती है, बारिश अब भी होती है, पर मेरे लिए हर आवाज़ अब एक सन्नाटा है।
क्योंकि जो सुनना चाहता था, वो अब कभी सुनाई नहीं देगा। तुम्हारा जाना एक घटना नहीं था, वो मेरे अंदर कुछ टूटने की शुरुआत थी जो अब तक हर रोज़ थोड़ा-थोड़ा टूटता ही जा रहा है। तुम शायद अब आगे बढ़ गई हो…
पर मैं आज भी वहीं खड़ा हूँ, उस आखिरी मोड़ पर, जहाँ हमारा हाथ छूटा था। मैं जी रहा हूँ…पर सच कहूँ तो, सिर्फ सांसें ले रहा हूँ
जिंदगी तो तुम्हारे साथ ही चली गई।

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अब तुम साथ नहीं हो 💕

अब तुम साथ नहीं हो… पर अजीब बात है, तुम्हारे जाने के बाद भी तुम गई नहीं। जब मैं खुद में होता हूँ, तब भी तुम्हारे होने से ही होता हूँ। उस तालाब के किनारे आज भी जाता हूँ कभी-कभी…नीम और पीपल की वही छाँव है, पर अब वहाँ सन्नाटा बैठा रहता है। मिट्टी की वही सोंधी खुशबू उठती है, मगर अब उसमें तुम्हारी हँसी नहीं घुलती, बस एक अधूरी याद रह जाती है। गाँव की गलियाँ अब भी वैसी ही हैं, पर उनमें तुम्हारे कदमों की आहट नहीं गूँजती। हर मोड़ पर आँखें तुम्हें ढूँढती हैं, और दिल चुपचाप समझा लेता है कि कुछ लोग अब सिर्फ यादों में ही मिलते हैं।
प्रकृति अब भी गाती है, कोयल भी कूकती है, बारिश भी होती है, पर अब वो गीत अधूरे लगते हैं, जैसे सुर तो हैं पर तुम नहीं। हवा जब गुजरती है, तो लगता है जैसे तुम्हारा नाम लेकर छू गई हो…और मैं बस उसी एहसास में ठहर जाता हूँ। तुमसे बिछड़ना शायद दूरी नहीं, एक खामोश साथ है, जहाँ तुम नहीं हो, फिर भी हर जगह हो। मैं अब भी वही हूँ…बस फर्क इतना है कि पहले तुम्हारे साथ जीता था, अब तुम्हारी यादों के साथ जी रहा हूँ।

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भाई की शादी 💕

आज बहुत समय बाद मौसी के गांव मल्लिन आया हूं। आज पूर्णिमा है, और मैं छत में चादर बिछाकर सोया हूं। पूर्णिमा का चांद ... अपने पूरे शबाब पर है। चारों तरफ दूधिया रोशनी फैली हुई है। गांव का स्वच्छ वातावरण, खुला आसमान, कुएं का ताजा मीठा पानी, घर के पीछे हरी ताजी सब्जियों की बाड़ी, दूर तक हरे भरे फसलों से लहकते खेत, मिट्टी का प्यारा सा घर, सिर पर घूंघट डाले महिलाएं, परंपराएं, वो बचपन में जिए हुए संस्कृति की महक ...कहने को बहुत कुछ है, लेकिन सुनने को अब वो नहीं है... वो याद आ जाती है जब गांव आता हूं। 


💕💕

रविवार, 15 फ़रवरी 2026

स्वयं का बोध 💐💐💐

स्वयं का बोध: -
जीवन बाहरी उपलब्धियों की दौड़ नहीं, बल्कि अपने अंतर्मन की खोज है। हम अक्सर दुनिया के शोर में खो जाते हैं, जबकि असली सत्य हमारे भीतर के सन्नाटे और शून्य में छिपा है। खुद को जानना ही सबसे बड़ा ज्ञान है।

परिवर्तन और संघर्ष: -
संसार का नियम बदलाव है। दुख और चुनौतियाँ हमें तोड़ने के लिए नहीं, बल्कि हमारे अहंकार को मिटाकर हमें माँजने के लिए आती हैं। जैसे आग सोने को शुद्ध करती है, संघर्ष हमारी चेतना को जगाता है।

वर्तमान ही सत्य: -
बीता हुआ कल एक स्मृति है और आने वाला कल एक भ्रम। सत्य केवल 'अभी' के इस पल में है। जीवन को सुलझाने की कोशिश छोड़कर, उसे पूरी जीवंतता के साथ महसूस करना ही सच्ची मुक्ति और आनंद है।

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मेरे बच्चों का ध्यान रखियेगा...💐💐💐

मेरी पत्नी और दोनों बेटियां भी बांधवगढ़ गए हैं। उनका ख्याल रखिएगा साहब। बांधवगढ़ की पावन और सुरम्य स्थल से आपका लाइव वीडियो देखा, मजा आ गया। मैं स्वास्थ्यगत कारणों से वहां नहीं पहुंच पाया, लेकिन मेरा ध्यान वहीं लगा हुआ है।

अब तो AI का दौर है, वो तो भावनाओं को भी एक्सप्रेस कर देता है, जो चाहो लिख देता है। लेकिन मेरी भावनाओं को वो नहीं लिख पाता, कुछ न कुछ तो कमी रह ही जाती है। मैं जीवंत हूं और वो मशीन, अंतर तो रहता ही है।

आज नींद नहीं आएगी। जब भी आपको सुनता हूं, नींद उड़ जाती है, धड़कनें तेज हो जाती हैं, सांसे थम जाती हैं। वो जो आपके चरणों के प्रति थोड़ा सा प्रेम है न वो मुझे कभी ठीक से सोने नहीं देती।

बस यूं ही... आज आपको निहारने का मन हो रहा है। आपके चरणों में सप्रेम साहेब बंदगी।

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तुम पढ़ो तो कोई बात बने... 💐💐💐

मेरे लिखने से क्या
तुम पढ़ो तो कोई बात बने।

मेरे सोचने से क्या,
तुम समझो तो कोई बात बने।

मै चुप हूं तो क्या,
तुम बोलो तो कोई बात बने।

मेरे चाहने से क्या,
तुम अहसास करो तो कोई बात बने।

मैं बेरंग हूं तो क्या,
तुम रंग भरो तो कोई बात बने।

💐💐💐





विरक्ति का मौन स्पर्श...💐💐💐

जीवन के किसी मोड़ पर ऐसा समय आता है जब मन थक जाता है। वही दिन, वही लोग, वही इच्छाएँ... समय के साथ सब कुछ होते हुए भी भीतर कुछ खाली सा लगता है। यह खालीपन केवल दुख नहीं होता, यह उस अनुभूति का संकेत है कि संसार का आकर्षण अब उतना स्थायी नहीं रहा जितना कभी प्रतीत होता था। धीरे धीरे मन प्रश्न करने लगता है कि क्या यह दौड़ अंतहीन है? क्या सुख सचमुच बाहरी वस्तुओं में है? जब इन प्रश्नों का स्पष्ट उत्तर नहीं मिलता, तब भीतर एक सूक्ष्म विरक्ति जन्म लेती है।

उदासी कभी कभी आत्मा का संकेत होती है कि वह कुछ और खोज रही है। कुछ स्थायी, कुछ गहरा। संसार की अस्थिरता को देखकर मन समझने लगता है कि यहाँ सब परिवर्तनशील है। जो आज अपना है, कल पराया हो सकता है। जो आज प्रिय है, वह भी एक दिन स्मृति बन सकता है। इस सत्य का बोध मन को हल्का भी करता है और गंभीर भी।

विरक्ति का अर्थ यह नहीं कि जीवन से भाग जाएँ। बल्कि इसका अर्थ है जीवन को समझकर जीना। प्रेम करते हुए भी अपेक्षा कम करना। सफलता मिले तो विनम्र रहना, असफलता आए तो स्थिर रहना। जब मन संसार के कोलाहल से हटकर मौन की ओर बढ़ता है, तब वह अपने भीतर एक शांत प्रकाश अनुभव करता है। वही प्रकाश उसे बताता है कि वास्तविक शांति बाहरी उपलब्धियों में नहीं, बल्कि भीतर की स्थिरता में है।

इस प्रकार उदासी और विरक्ति जीवन की पराजय नहीं, बल्कि एक गहरी समझ का प्रारंभ है जहाँ मन संसार में रहते हुए भी उससे बँधा नहीं रहता।

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मंगलवार, 20 जनवरी 2026

चादर तिलक (23 जनवरी 2026)

साहब कबीर की परंपरा में गुरु केवल मार्गदर्शक नहीं होते, वे साधना, मर्यादा और चेतना की अखंड परंपरा के संवाहक होते हैं। चादर तिलक का यह अवसर इसी पवित्र गुरु परंपरा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण, ऐतिहासिक, मंगलमय और पावन क्षण है। इस अवसर पर पंथ श्री प्रकाश मुनि नाम साहब, निःशब्द रूप से धर्मदास साहब एवं आमीन माता साहब की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए, उसे  पंथ श्री उदितमुनि नाम साहब एवं पंथ श्री प्रखर प्रताप साहब नाम साहब को सौंपेंगे।

गुरु और शिष्य के बीच घटित यह क्षण आत्मा से आत्मा का संवाद होता है, जहाँ कहा कुछ नहीं जाता, फिर भी सब कुछ संप्रेषित हो जाता है। धर्मदास साहब और आमीन माता साहब की परंपरा का मूल भाव ही निःशब्द साधना और भक्ति का समन्वय है। यहाँ सत्य को व्यक्त नहीं किया जाता, बल्कि जीया जाता है।

जब पंथ श्री प्रकाश मुनि नाम साहब के माध्यम से यह परंपरा पंथ श्री उदितमुनि नाम साहब और पंथ श्री प्रखर प्रताप साहब को सौंपी जाएगी, तब वह केवल एक विधि नहीं होगी, बल्कि नाम परंपरा की अखंड धारा का निःशब्द प्रवाह होगा।

साहब के असंख्य अनुयायियों के बीच, जिनकी आँखों में भक्ति की नमी है, हृदयों में प्रेम की कोमलता है और साँसों में साहब का नाम, उन सबके बीच मैं भी अपने पूरे परिवार के साथ भीगी पलकों, थरथराती भावनावों के साथ उस दिव्य पल का साक्षी बनूँगा।

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अनंत की खोज...💐💐💐

जीवन क्या है... यह प्रश्न जितना पुराना है, उतना ही नया भी। मनुष्य जन्म लेता है, बढ़ता है, सपने देखता है, प्रेम करता है, संघर्ष क...