बुधवार, 22 अगस्त 2018

सो सतगुरु मोहे भावे संतो...💐

सुख और दुख हमारे जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक है। जैसे चलने के दायां और बायां पैर जरूरी है, काम करने के लिए दायां और बायां हाथ जरूरी है, चबाने के लिए ऊपर और नीचे का जबड़ा जरूरी है।

वैसे ही जीवन की उड़ान के लिए सुख और दुख रूपी दो पंख जरूरी हैं। लेकिन सुख और दुख का ठीक उपयोग हम नहीं कर पाते, उनसे प्रभावित हो जाते हैं, उनमें रस लेने लग जाते हैं, इसीलिए जीवन भर शरीर और इच्छाओ से बंधे ही रह जाते हैं, अपने मुक्त स्वभाव का पता नहीं चलता।

ऐसे में साहब सारे बंधनों को हटाकर हमें अपने निज स्वरूप का बोध कराते हैं, और कहते हैं:-

संतो सो सदगुरु मोहे भावे,
जो आवागमन मिटावे...
कर्म करे और रहे अकर्मी
ऐसी युक्ति बतावे...
कहें कबीर सतगुरु सोई साँचा,
घट में अलख लखावे...
संतो सो सद्गुरु मोहे भावे।।

💐💐💐

1 टिप्पणी:

  1. संतो सो सदगुरु मोहे भावे,
    जो नैनन अलख लखावै।
    डोलत डिगै न बोलत बिसरै,
    अस उपदेश सुनावै।
    द्वार न रूँधे पवन न रोके,
    नहीं अनहद अरुझावै।
    यह मन जाय जहां लग जबहीं,
    परमातम दरसावै।
    कर्म करै और रहै अकर्मी
    ऐसी युक्ति बतावै।
    सदा बिलास त्रास नहीं मन में,
    भोग में जोग जगावै।
    धरती त्यागि अकासहुँ त्यागै,
    अधर मड़इया छावै।
    सुन्न सिखर की सार सिला पर,
    आसन अचल जमावै।
    एकहि सब सुख-दुख दिखलावै,
    सबद में सुरति समावै।
    कहैं कबीर सतगुरु सोई साँचा,
    घट में अलख लखावै।।
    इस पूरे पद में सद्गुरु कबीर साहेब ने सच्चे सद्गुरु की विशेषताओं का उल्लेख किया है। इस पद में विशेष करके इस पद की अन्तिम पंक्ति ध्यान देने योग्य है जिसमें कबीर साहेब ने यह बताया है कि सच्चा सद्गुरु वही है जो इस शरीर के भीतर अलख यानी परमात्मा को दिखा दे। यदि कोई गुरू ऐसा करने में समर्थ नहीं है तो वह सद्गुरु कहलाने के योग्य नहीं है।

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