खैर, अभी तो कुछ और चेहरे भी आएंगे, जो सूखे हुए फूल, पत्ते, टहनियां भी काट छाँटकर ले जाएंगे। जीवन का यही दस्तूर है। जीवन भी कहाँ हार मानने वाला है, वो तो हर हाल में विषम परिस्थितियों में भी नए अंकुरों के रूप में कहीं भी प्रस्फुटित हो जाया करता है।
शुक्रवार, 17 जनवरी 2020
पतझड़ आ गया...💐
रिश्तों के पंख पखेरू पतझड़ के आगमन से पहले ही उड़ गए। हरितिमा की घूंघट में सजे चेहरों के बनावटी रंग भी समय के साथ धूल गए। वो पेड़ों की साखों से फूल, फल और पत्तियाँ (स्वार्थ) लेकर अपने अपने रास्ते निकल पड़े। वो सदा की तरह ठूँठ खड़ा उन्हें जाते हुए ताक रहा है। लगता है इस बरस पतझड़ का मौसम बहुत जल्दी ही आया।
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
अनंत की खोज...💐💐💐
जीवन क्या है... यह प्रश्न जितना पुराना है, उतना ही नया भी। मनुष्य जन्म लेता है, बढ़ता है, सपने देखता है, प्रेम करता है, संघर्ष क...
-
जो तू चाहे मुझको, छोड़ सकल की आस। मुझ ही जैसा होय रहो, सब सुख तेरे पास।। कुछ दिनों से साहब की उपरोक्त वाणी मन में घूम रही थी। सोचा उनके जैस...
-
सुख और दुख हमारे जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक है। जैसे चलने के दायां और बायां पैर जरूरी है, काम करने के लिए दायां और बायां हाथ जरूरी है, चबाने ...
-
चिड़िया को देखता हूँ तो लगता है, प्रकृति ने जीवन का सबसे बड़ा सत्य उसके छोटे से हृदय में छुपा रखा है। वह सुबह अपने घोंसले से उड़ जाती है... ...