आज बहुत समय बाद मौसी के गांव मल्लिन आया हूं। आज पूर्णिमा है, और मैं छत में चादर बिछाकर सोया हूं। पूर्णिमा का चांद ... अपने पूरे शबाब पर है। चारों तरफ दूधिया रोशनी फैली हुई है। गांव का स्वच्छ वातावरण, खुला आसमान, कुएं का ताजा मीठा पानी, घर के पीछे हरी ताजी सब्जियों की बाड़ी, दूर तक हरे भरे फसलों से लहकते खेत, मिट्टी का प्यारा सा घर, सिर पर घूंघट डाले महिलाएं, परंपराएं, वो बचपन में जिए हुए संस्कृति की महक ...कहने को बहुत कुछ है, लेकिन सुनने को अब वो नहीं है... वो याद आ जाती है जब गांव आता हूं।
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