बुधवार, 24 जून 2026

खोज ... 💐💐💐

जीवन का एक बड़ा सत्य यह है कि समय के साथ मनुष्य का मोह धीरे धीरे टूटने लगता है। बचपन में जिन खिलौनों के बिना जीवन अधूरा लगता था, बड़े होने पर वे कहीं खो जाते हैं और उनकी याद भी नहीं रहती। फिर नए सपने आते हैं, नई इच्छाएँ आती हैं, और मन उन्हीं में उलझ जाता है।

युवावस्था में मन रिश्तों में अर्थ खोजता है। प्रेम में सुख खोजता है। परिवार में अपना संसार देखता है। धन कमाने में अपनी सफलता देखता है। लगता है कि यही सब जीवन का आधार है। इन्हीं के लिए मनुष्य दिन रात भागता है, संघर्ष करता है, सपने बुनता है।

धीरे धीरे जीवन मनुष्य को सिखाता है कि संसार की हर वस्तु परिवर्तनशील है। लोग बदलते हैं। परिस्थितियाँ बदलती हैं। रिश्तों की गर्माहट भी समय के साथ बदल जाती है। जिन लोगों के बिना कभी एक दिन बिताना कठिन लगता था, उन्हीं से कभी कभी महीनों बात नहीं होती। जिन वस्तुओं को पाने के लिए जीवन भर परिश्रम किया, एक समय के बाद वे भी साधारण लगने लगती हैं।

धन आवश्यक है, लेकिन एक सीमा के बाद वह मन की प्यास नहीं बुझा पाता। सम्मान अच्छा लगता है, लेकिन वह भी स्थायी संतोष नहीं दे पाता। परिवार जीवन का आधार है, लेकिन वहाँ भी सब कुछ हमेशा वैसा नहीं रहता जैसा हम चाहते हैं।

धीरे धीरे मनुष्य समझने लगता है कि वह जिन चीजों को स्थायी मान रहा था, वे सब अस्थायी हैं।
यह समझ कभी एक दिन में नहीं आती। यह अनुभवों से आती है। सुख और दुःख दोनों से आती है। बिछड़नों से आती है। उम्र के बढ़ते कदमों के साथ आती है। फिर एक समय ऐसा आता है जब मन भीतर की ओर देखने लगता है। उसे महसूस होता है कि जिन चीजों को वह जीवन भर पकड़कर रखना चाहता था, वे सब हाथों से फिसलती चली जा रही हैं। तब उसके भीतर एक नई खोज जन्म लेती है।

वह खोज किसी व्यक्ति की नहीं होती। वह खोज किसी धन या पद की नहीं होती। वह खोज शांति की होती है। वह खोज स्वयं को समझने की होती है। तब मनुष्य को लगता है कि शायद जीवन का उद्देश्य केवल संग्रह करना नहीं था। केवल रिश्ते बनाना नहीं था। केवल नाम और पहचान कमाना नहीं था। इन सबके पीछे कोई और गहरा अर्थ छिपा हुआ है। मोहभंग का अर्थ यह नहीं कि मनुष्य प्रेम करना छोड़ दे या परिवार से दूर हो जाए। इसका अर्थ केवल इतना है कि वह इन सबको उनके वास्तविक स्वरूप में देखना सीख जाए। वह समझ जाए कि सब कुछ अनमोल है, लेकिन सब कुछ क्षणभंगुर भी है। जब यह समझ आती है, तब मन में एक नई शांति जन्म लेती है। अपेक्षाएँ कम होने लगती हैं। शिकायतें घटने लगती हैं। और जीवन पहले से अधिक सरल लगने लगता है। शायद यही परिपक्वता है।
शायद यही जीवन का वह मोड़ है, जहाँ मनुष्य संसार में रहते हुए भी उससे थोड़ा ऊपर उठने लगता है। और तब उसे समझ में आता है कि जीवन का सबसे बड़ा सहारा न धन है, न पद है, न प्रसिद्धि है।

सबसे बड़ा सहारा वह आंतरिक शांति है, जो तब जन्म लेती है जब मोह धीरे धीरे कम होने लगता है और मन सत्य के निकट पहुँचने लगता है। जितनी जल्दी इस जगत से मोहभंग हो जाए उतना ही अच्छा है।

✍️ Lekhraj Sahu

अनंत की खोज...💐💐💐


जीवन क्या है... यह प्रश्न जितना पुराना है, उतना ही नया भी। मनुष्य जन्म लेता है, बढ़ता है, सपने देखता है, प्रेम करता है, संघर्ष करता है और एक दिन इस संसार से चला जाता है। इस छोटी सी यात्रा में वह न जाने कितनी चीजों को अपना मान लेता है। यह मेरा घर है, मेरा परिवार है, मेरा धन है, मेरी पहचान है। लेकिन समय धीरे धीरे उसके हाथों से सब कुछ छीन लेता है और अंत में वह खाली हाथ ही चला जाता है।

तब मन में एक प्रश्न उठता है, यदि सब कुछ यहीं छूट जाना है, तो वास्तव में हमारा है क्या?
संतों और ऋषियों ने कहा कि यह संसार एक स्वप्न के समान है। जो आज सत्य प्रतीत होता है, वह कल स्मृति बन जाता है। जो आज अपना लगता है, वह कल पराया हो जाता है। यह जगत परिवर्तनशील है, इसलिए इसे अंतिम सत्य नहीं कहा जा सकता। पर इसका अर्थ यह भी नहीं कि जीवन निरर्थक है। यदि संसार क्षणभंगुर है, तो इसी क्षणभंगुरता के भीतर किसी शाश्वत तत्व की खोज करना ही मनुष्य जीवन का उद्देश्य है।

क्या वह अत्यंत सुंदर होगा, क्या वह भयंकर डरावना होगा अथवा हमारी कल्पनाओं से भी परे होगा? इन प्रश्नों का उत्तर किसी पुस्तक में नहीं मिलता। उत्तर केवल अनुभव में मिलता है। यही कारण है कि सच्चा साधक केवल मान्यताओं से संतुष्ट नहीं होता। वह जानना चाहता है। वह देखना चाहता है। वह अनुभव करना चाहता है। उसके भीतर एक प्यास जन्म लेती है। यह प्यास धन की नहीं होती, सम्मान की नहीं होती, बल्कि सत्य की होती है।

ध्यान उसी प्यास का नाम है। सुमिरन उसी पुकार का नाम है। प्रार्थना उसी प्रेम का नाम है। जब मनुष्य कुछ क्षणों के लिए संसार के शोर से दूर होकर अपने भीतर उतरता है, तब उसे अनुभव होने लगता है कि जिस परमात्मा को वह बाहर खोज रहा था, उसकी झलक तो भीतर भी मौजूद है। मन की गहराइयों में एक मौन है। उस मौन में एक अदृश्य उपस्थिति है। वही उपस्थिति जीवन को धारण किए हुए है।

परमात्मा की खोज किसी स्थान की यात्रा नहीं है यह भीतर की यात्रा है। यह यात्रा अनंत की ओर है। यह यात्रा स्वयं को खोकर स्वयं को पाने की यात्रा है। जैसे नदी समुद्र की ओर बहती है, वैसे ही आत्मा भी अपने स्रोत की ओर लौटना चाहती है। इसी कारण संसार की सभी उपलब्धियों के बाद भी मनुष्य के भीतर एक रिक्तता बनी रहती है। धन मिल जाता है, परिवार मिल जाता है, प्रेम मिल जाता है, सम्मान मिल जाता है, फिर भी कहीं न कहीं लगता है कि कुछ अभी शेष है।
वह जो शेष है, वही परमात्मा की पुकार है।
वही अनंत की स्मृति है।

वही उस मूल घर की याद है, जहाँ से हम आए हैं।
यदि परमात्मा ने हमें चेतना दी है, विवेक दिया है, प्रश्न करने की क्षमता दी है, तो निश्चय ही उसने हमें खोज के लिए ही भेजा है। केवल जन्म लेना, भोजन करना, संघर्ष करना और एक दिन आँखें बंद कर लेना ही मनुष्य जीवन का उद्देश्य नहीं हो सकता।

मनुष्य का वास्तविक सौभाग्य तब आरंभ होता है, जब उसके भीतर यह प्रश्न जागता है:-
मैं कौन हूँ?
मैं कहाँ से आया हूँ?
और मुझे कहाँ लौटना है?
जिस दिन यह प्रश्न हृदय में अग्नि बनकर जलने लगते हैं, उसी दिन आध्यात्मिक यात्रा आरंभ हो जाती है।

✍️ Lekhraj Sahu ❤️

गुरुवार, 11 जून 2026

पहला प्यार 💕

सब्ज़ियों की एक छोटी सी बाड़ी थीवहीं मिट्टी की सोंधी खुशबू, हरी पत्तियों की सरसराहट और धड़कते हुए दिलों के बीच उसने मुझे बुलाया था और एक प्रेम पत्र दिया था। उस पल में जैसे पूरा संसार ठहर गया था। शब्द तो उस कागज़ पर लिखे थे, लेकिन उन्हें पढ़ने से पहले ही उसकी झुकी हुई नज़रें और काँपती हुई मुस्कान सब कुछ कह चुकी थीं।

फिर एक ऐसा क्षण आया, जो समय की धूल में दबकर भी कभी धुंधला नहीं पड़ा। उसने धीरे से मेरे गाल पर एक चुंबन किया और अपने घर की ओर भाग गई, और वह पल मेरी स्मृतियों में हमेशा के लिए ठहर गया। उस उम्र में वह क्षण किसी अनमोल ख़ज़ाने से कम नहीं था। धड़कनें तेज़ हो गई थीं, शब्द जैसे कहीं खो गए थे, और मन एक अजीब सी खुशी से भर उठा था।

उसके घर के पास एक तालाब था। तालाब के पानी पर पुरइन के गोल, चौड़े हरे पत्ते तैरते रहते थे और उनके बीच खिले गुलाबी कमल के फूल मानो किसी प्रेम कहानी के मौन साक्षी हों। सुबह की पहली किरण जब उन कमलों पर पड़ती थी, तो पूरा तालाब सोने सा चमक उठता था। शाम को ढलते सूरज की लालिमा उन पुरइन के पत्तों और कमल के फूलों पर बिखर जाती थी, और ऐसा लगता था मानो प्रकृति स्वयं प्रेम का कोई गीत गुनगुना रही हो।

तालाब के किनारे खड़े नीम और पीपल के पेड़ अपनी घनी छाँव फैलाए रहते थे। उनकी पत्तियों से गुजरती हवा में एक अजीब सी मिठास थी। उन्हीं रास्तों पर चलते हुए, उन्हीं पेड़ों की छाँव में खड़े होकर, न जाने कितनी बार मैंने उसकी एक झलक पाने की प्रतीक्षा की थी।

आज इतने वर्षों बाद भी जब उस बाड़ी, उस तालाब, पुरइन के पत्तों, गुलाबी कमलों, नीम और पीपल की छाँव को याद करता हूँ, तो वह मासूम सा प्रेम भी यादों के आँगन में उतर आता है। लगता है जैसे समय बहुत आगे बढ़ गया हो, पर मन का एक कोना अब भी वहीं ठहरा हुआ है... उसी प्रेम पत्र के पास... उसी मुस्कान के पास... और उसी पहले चुंबन के पास।

कुछ प्रेम कहानियाँ पूरी नहीं होतीं, फिर भी अधूरी नहीं कहलातीं। वे जीवन के किसी शांत तालाब में खिले कमल की तरह होती हैं... जिनकी सुंदरता समय बीत जाने के बाद भी स्मृतियों के जल में सदा खिली रहती है।

✍️ Lekhraj Sahu ❤️

शुक्रवार, 22 मई 2026


मेरी बेटियाँ... मेरे घर की धड़कनें 💕


गर्मियों की छुट्टियाँ आते ही घर का रंग कुछ बदल जाता है। बच्चों की आँखों में नानी के घर जाने की चमक उतर आती है। मामा-मामी, गाँव की गलियाँ, आम के पेड़, नानी के हाथ का खाना... इन सबका आकर्षण उन्हें अपनी ओर खींच लेता है। पत्नी भी कुछ दिनों के लिए अपने माँ-पापा, भाई-भाभी और अपनों से मिलने चली जाती है। यह स्वाभाविक है... होना भी चाहिए। पर उनके जाने के बाद इस घर में जो सन्नाटा उतरता है, उसे शब्दों में कहना आसान नहीं।


मैं यहाँ रायपुर में अकेला रह जाता हूँ... पर सच कहूँ तो मेरा मन भी वहीं उनके पास ही भटकता रहता है। मेरा घर तो मेरी दोनों बेटियों की हँसी से आबाद रहता है। उनकी मीठी बातें पूरे दिन घर-आँगन में ऐसे गूँजती रहती हैं, जैसे किसी मंदिर में सुबह की घंटियाँ। शाम को जब ऑफिस से लौटता हूँ, तो दरवाज़े पर दो जोड़ी चमकती आँखें मेरा इंतज़ार करती मिलती हैं। उन आँखों में कितनी उम्मीदें होती हैं... पापा आज क्या लाए होंगे... चॉकलेट... कुरकुरे... चिप्स... या हमारी पसंद की कोई छोटी-सी चीज़...और मैं हर दिन उनके उस इंतज़ार में अपना संसार देखता हूँ।

मेरी बेटियाँ कुछ अलग हैं... बहुत अलग। वे केवल मेरी बेटियाँ नहीं, मेरे दिन भर की थकान का मरहम हैं। कभी मैं थका-हारा बैठा होता हूँ, तो उनके छोटे-छोटे, कोमल हाथ मेरे सिर पर आ जाते हैं। वे अपने नन्हे हाथों से जैसे कोई जादू करती हैं... धीरे-धीरे सिर दबाती हैं, और फिर प्यार से मेरा माथा चूम लेती हैं। उस एक क्षण में दिन भर की सारी थकान जाने कहाँ खो जाती है।
कभी पूछती हैं... "पापा, दवाई खा ली क्या?"
"पापा, तबियत अब ठीक है न?" उनकी यह चिंता देखकर मन भीतर तक भीग जाता है। सोचता हूँ... ये छोटी-सी जानें इतना स्नेह कहाँ से ले आती हैं?

दिन भर घर में उनका अपना एक अलग संसार चलता है। कभी नाचना, कभी गुनगुनाना, कभी कपड़े बदल-बदलकर आईने के सामने इठलाना, कभी खुद को राजकुमारी समझना, कभी माँ की चूड़ियाँ पहन लेना... और फिर खिलखिलाकर हँस देना।

मेरी बड़ी बिटिया चित्रा अब 9वीं कक्षा में है, बहुत समझदार, बहुत गंभीर, हमेशा मर्यादित, भावनाओं की गहराई को समझने वाली... छोटी बिटिया आराध्या अपने नाम की तरह ही पूजा-सी निर्मल, थोड़ी शरारती, थोड़ी जिद्दी। दोनों के बीच छोटी-छोटी लड़ाइयाँ भी होती हैं... कभी खिलौने को लेकर, कभी रिमोट को लेकर, कभी बिना वजह ही। फिर उनकी मम्मी वर्षा बीच में आती हैं... प्यार से समझाती हैं, कभी डाँटती हैं, कभी खुद हँस पड़ती हैं। और मैं... मैं चुपचाप यह सब देखता रहता हूँ।

हाँ... मैं चुपके से सब देखता हूँ। उन्हें हर दिन थोड़ा-थोड़ा बड़ा होते देखता हूँ। उनकी बदलती बातें, बदलती पसंद, उनकी बढ़ती समझ... सब देखता हूँ। और हर दिन भीतर कहीं एक अजीब-सी कसक भी उठती है... कि ये नन्हे पल कितनी जल्दी बीत जाएँगे। कभी-कभी रात को लगता है, जीवन में यदि कुछ सचमुच ईश्वर का दिया हुआ सबसे सुंदर उपहार है, तो वह बच्चों की हँसी है। माता-पिता होना केवल जिम्मेदारी नहीं... यह तो ईश्वर द्वारा सौंपा गया प्रेम का सबसे पवित्र रूप है।

आज जब वे घर में नहीं हैं, तो यह मकान सिर्फ दीवारों का ढाँचा लगता है। न वह शोर है, न वह खिलखिलाहट, न वह "पापा आ गए" की पुकार और तब समझ आता है... घर ईंट-पत्थरों से नहीं बनता... घर उन नन्हे कदमों की आहट से बनता है, उन छोटी हथेलियों के स्पर्श से बनता है, पत्नी के मौन स्नेह से बनता है।

एक दिन लौट आना है अपनी मिट्टी में...💕

चिड़िया को देखता हूँ तो लगता है, प्रकृति ने जीवन का सबसे बड़ा सत्य उसके छोटे से हृदय में छुपा रखा है। वह सुबह अपने घोंसले से उड़ जाती है... न उसे कड़ी धूप की परवाह होती है, न बरसते बादलों की, न मीलों की दूरियों का भय। उसकी छोटी-सी चोंच में केवल एक संकल्प होता है... अपने बच्चों के लिए दाना जुटाना। पर जैसे ही सांझ उतरती है, आकाश पर लौटते पंछियों की कतारें बनती हैं, वह भी अपने घोंसले की ओर लौट पड़ती है... अपनी नन्ही संतानों के पास, अपने घर, अपने अपनापन के पास।

शायद मनुष्य भी कुछ ऐसा ही है... बस अंतर इतना है कि चिड़िया हर शाम लौट आती है, और मनुष्य लौटने की इच्छा को वर्षों तक अपने भीतर दबाए जीता रहता है।

हम भी तो अपने गाँव, अपने घर, अपनी जन्मभूमि, अपने माँ-बाबूजी, भाई-बहनों, बचपन के दोस्तों को छोड़कर निकल पड़ते हैं... किसी दूसरे शहर, किसी अनजान दुनिया में... केवल इस आशा में कि आने वाली पीढ़ियों का भविष्य उज्ज्वल हो। दिन भर काम की दौड़, जिम्मेदारियों का बोझ, और रात को थके हुए मन में अचानक किसी पुराने आँगन की याद उतर आती है। मिट्टी की वह सोंधी महक, खेतों में लहराती हरी फसलें, तालाब के शांत पानी पर डूबता सूरज, नीम और पीपल की ठंडी छाँव... सब स्मृतियों में आकर मन को भिगो जाते हैं।

याद आता है वह बचपन, जब स्वच्छ चाँदनी रातों में आँगन में सबके बिस्तर बिछते थे। दादा जी आसमान के तारों को दिखाकर कहानियाँ सुनाते थे। दादी माँ की गोद में सिर रखते ही जैसे सारी दुनिया का भय समाप्त हो जाता था। नाना-नानी के किस्सों में राजकुमार होते थे, परियों के महल होते थे, और हम उन कहानियों में खोकर कब नींद की बाहों में चले जाते थे, पता ही नहीं चलता था।

आज बड़े शहरों की ऊँची इमारतों में खिड़की से झाँकता हूँ तो आकाश भी अधूरा लगता है। वहाँ चाँद तो है, पर वैसी आत्मीयता नहीं। हवा तो है, पर उसमें अपनी मिट्टी की खुशबू नहीं। लोग तो हैं, पर अपनेपन की वह गर्माहट नहीं। यहाँ जीवन चलता तो है... पर कई बार लगता है जैसे हम जी नहीं रहे, बस निभा रहे हैं।

कभी-कभी मन बहुत प्यासा हो उठता है... उस आवाज़ के लिए, जो माँ रसोई से पुकारती थी। उस स्पर्श के लिए, जिसमें बाबूजी का मौन स्नेह छुपा होता था। उस हँसी के लिए, जो भाइयों के साथ बेवजह गूँजती थी। उन दोस्तों के लिए, जिनके साथ नंगे पाँव खेतों की मेड़ों पर दौड़ना ही सबसे बड़ा सुख था।

जीवन सचमुच एक खानाबदोश यात्रा जैसा लगता है। हम कहाँ से निकले थे... कहाँ पहुँचना था... और कहाँ भटक गए... यह किसी को नहीं मालूम। बस चलते जाते हैं, जिम्मेदारियों की गठरी कंधों पर उठाए हुए। और फिर एक दिन खबर आती है... कोई लौट आया... लेकिन अपने पैरों से नहीं... चार कंधों पर।

यह सोचकर हृदय काँप उठता है... क्या सचमुच मनुष्य अपनी जन्मभूमि में लौटता ही तब है, जब उसकी साँसें साथ छोड़ चुकी होती हैं? नहीं... मन कहता है, इससे पहले लौटना चाहिए। एक बार फिर उस मिट्टी को माथे से लगाना चाहिए, जहाँ पहला कदम रखा था। उस नीम के पेड़ को छूना चाहिए, जिसने बचपन की धूप से बचाया था। उस तालाब के किनारे बैठना चाहिए, जहाँ सपने पहली बार पानी में अपना चेहरा देखते थे। उस आँगन में फिर लेटना चाहिए, जहाँ चाँदनी बिना बुलाए उतर आती थी।

एक दिन मुझे भी लौट आना है... अपनी मिट्टी में... अपने दादा-दादी की स्मृतियों की गोद में... अपने नन्हे दोस्तों की हँसी के पास... उस गाँव की पगडंडियों पर, जहाँ मेरा बचपन अब भी शायद मेरा इंतज़ार कर रहा है। क्योंकि अंत में मनुष्य कहीं और का नहीं होता... वह अपनी मिट्टी का ही होता है... हमेशा...।

खोज ... 💐💐💐

जीवन का एक बड़ा सत्य यह है कि समय के साथ मनुष्य का मोह धीरे धीरे टूटने लगता है। बचपन में जिन खिलौनों के बिना जीवन अधूरा लगता था,...