सब्ज़ियों की एक छोटी सी बाड़ी थी।वहीं मिट्टी की सोंधी खुशबू, हरी पत्तियों की सरसराहट और धड़कते हुए दिलों के बीच उसने मुझे बुलाया था और एक प्रेम पत्र दिया था। उस पल में जैसे पूरा संसार ठहर गया था। शब्द तो उस कागज़ पर लिखे थे, लेकिन उन्हें पढ़ने से पहले ही उसकी झुकी हुई नज़रें और काँपती हुई मुस्कान सब कुछ कह चुकी थीं।
फिर एक ऐसा क्षण आया, जो समय की धूल में दबकर भी कभी धुंधला नहीं पड़ा। उसने धीरे से मेरे गाल पर एक चुंबन किया और अपने घर की ओर भाग गई, और वह पल मेरी स्मृतियों में हमेशा के लिए ठहर गया। उस उम्र में वह क्षण किसी अनमोल ख़ज़ाने से कम नहीं था। धड़कनें तेज़ हो गई थीं, शब्द जैसे कहीं खो गए थे, और मन एक अजीब सी खुशी से भर उठा था।
उसके घर के पास एक तालाब था। तालाब के पानी पर पुरइन के गोल, चौड़े हरे पत्ते तैरते रहते थे और उनके बीच खिले गुलाबी कमल के फूल मानो किसी प्रेम कहानी के मौन साक्षी हों। सुबह की पहली किरण जब उन कमलों पर पड़ती थी, तो पूरा तालाब सोने सा चमक उठता था। शाम को ढलते सूरज की लालिमा उन पुरइन के पत्तों और कमल के फूलों पर बिखर जाती थी, और ऐसा लगता था मानो प्रकृति स्वयं प्रेम का कोई गीत गुनगुना रही हो।
तालाब के किनारे खड़े नीम और पीपल के पेड़ अपनी घनी छाँव फैलाए रहते थे। उनकी पत्तियों से गुजरती हवा में एक अजीब सी मिठास थी। उन्हीं रास्तों पर चलते हुए, उन्हीं पेड़ों की छाँव में खड़े होकर, न जाने कितनी बार मैंने उसकी एक झलक पाने की प्रतीक्षा की थी।
आज इतने वर्षों बाद भी जब उस बाड़ी, उस तालाब, पुरइन के पत्तों, गुलाबी कमलों, नीम और पीपल की छाँव को याद करता हूँ, तो वह मासूम सा प्रेम भी यादों के आँगन में उतर आता है। लगता है जैसे समय बहुत आगे बढ़ गया हो, पर मन का एक कोना अब भी वहीं ठहरा हुआ है... उसी प्रेम पत्र के पास... उसी मुस्कान के पास... और उसी पहले चुंबन के पास।
कुछ प्रेम कहानियाँ पूरी नहीं होतीं, फिर भी अधूरी नहीं कहलातीं। वे जीवन के किसी शांत तालाब में खिले कमल की तरह होती हैं... जिनकी सुंदरता समय बीत जाने के बाद भी स्मृतियों के जल में सदा खिली रहती है।
✍️ Lekhraj Sahu ❤️
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