शुक्रवार, 22 मई 2026

मेरी बेटियाँ... मेरे घर की धड़कनें 💕


गर्मियों की छुट्टियाँ आते ही घर का रंग कुछ बदल जाता है। बच्चों की आँखों में नानी के घर जाने की चमक उतर आती है। मामा-मामी, गाँव की गलियाँ, आम के पेड़, नानी के हाथ का खाना... इन सबका आकर्षण उन्हें अपनी ओर खींच लेता है। पत्नी भी कुछ दिनों के लिए अपने माँ-पापा, भाई-भाभी और अपनों से मिलने चली जाती है। यह स्वाभाविक है... होना भी चाहिए। पर उनके जाने के बाद इस घर में जो सन्नाटा उतरता है, उसे शब्दों में कहना आसान नहीं।


मैं यहाँ रायपुर में अकेला रह जाता हूँ... पर सच कहूँ तो मेरा मन भी वहीं उनके पास ही भटकता रहता है। मेरा घर तो मेरी दोनों बेटियों की हँसी से आबाद रहता है। उनकी मीठी बातें पूरे दिन घर-आँगन में ऐसे गूँजती रहती हैं, जैसे किसी मंदिर में सुबह की घंटियाँ। शाम को जब ऑफिस से लौटता हूँ, तो दरवाज़े पर दो जोड़ी चमकती आँखें मेरा इंतज़ार करती मिलती हैं। उन आँखों में कितनी उम्मीदें होती हैं... पापा आज क्या लाए होंगे... चॉकलेट... कुरकुरे... चिप्स... या हमारी पसंद की कोई छोटी-सी चीज़...और मैं हर दिन उनके उस इंतज़ार में अपना संसार देखता हूँ।

मेरी बेटियाँ कुछ अलग हैं... बहुत अलग। वे केवल मेरी बेटियाँ नहीं, मेरे दिन भर की थकान का मरहम हैं। कभी मैं थका-हारा बैठा होता हूँ, तो उनके छोटे-छोटे, कोमल हाथ मेरे सिर पर आ जाते हैं। वे अपने नन्हे हाथों से जैसे कोई जादू करती हैं... धीरे-धीरे सिर दबाती हैं, और फिर प्यार से मेरा माथा चूम लेती हैं। उस एक क्षण में दिन भर की सारी थकान जाने कहाँ खो जाती है।
कभी पूछती हैं... "पापा, दवाई खा ली क्या?"
"पापा, तबियत अब ठीक है न?" उनकी यह चिंता देखकर मन भीतर तक भीग जाता है। सोचता हूँ... ये छोटी-सी जानें इतना स्नेह कहाँ से ले आती हैं?

दिन भर घर में उनका अपना एक अलग संसार चलता है। कभी नाचना, कभी गुनगुनाना, कभी कपड़े बदल-बदलकर आईने के सामने इठलाना, कभी खुद को राजकुमारी समझना, कभी माँ की चूड़ियाँ पहन लेना... और फिर खिलखिलाकर हँस देना।

मेरी बड़ी बिटिया चित्रा अब 9वीं कक्षा में है, बहुत समझदार, बहुत गंभीर, हमेशा मर्यादित, भावनाओं की गहराई को समझने वाली... छोटी बिटिया आराध्या अपने नाम की तरह ही पूजा-सी निर्मल, थोड़ी शरारती, थोड़ी जिद्दी। दोनों के बीच छोटी-छोटी लड़ाइयाँ भी होती हैं... कभी खिलौने को लेकर, कभी रिमोट को लेकर, कभी बिना वजह ही। फिर उनकी मम्मी वर्षा बीच में आती हैं... प्यार से समझाती हैं, कभी डाँटती हैं, कभी खुद हँस पड़ती हैं। और मैं... मैं चुपचाप यह सब देखता रहता हूँ।

हाँ... मैं चुपके से सब देखता हूँ। उन्हें हर दिन थोड़ा-थोड़ा बड़ा होते देखता हूँ। उनकी बदलती बातें, बदलती पसंद, उनकी बढ़ती समझ... सब देखता हूँ। और हर दिन भीतर कहीं एक अजीब-सी कसक भी उठती है... कि ये नन्हे पल कितनी जल्दी बीत जाएँगे। कभी-कभी रात को लगता है, जीवन में यदि कुछ सचमुच ईश्वर का दिया हुआ सबसे सुंदर उपहार है, तो वह बच्चों की हँसी है। माता-पिता होना केवल जिम्मेदारी नहीं... यह तो ईश्वर द्वारा सौंपा गया प्रेम का सबसे पवित्र रूप है।

आज जब वे घर में नहीं हैं, तो यह मकान सिर्फ दीवारों का ढाँचा लगता है। न वह शोर है, न वह खिलखिलाहट, न वह "पापा आ गए" की पुकार और तब समझ आता है... घर ईंट-पत्थरों से नहीं बनता... घर उन नन्हे कदमों की आहट से बनता है, उन छोटी हथेलियों के स्पर्श से बनता है, पत्नी के मौन स्नेह से बनता है।

एक दिन लौट आना है अपनी मिट्टी में...💕

चिड़िया को देखता हूँ तो लगता है, प्रकृति ने जीवन का सबसे बड़ा सत्य उसके छोटे से हृदय में छुपा रखा है। वह सुबह अपने घोंसले से उड़ जाती है... न उसे कड़ी धूप की परवाह होती है, न बरसते बादलों की, न मीलों की दूरियों का भय। उसकी छोटी-सी चोंच में केवल एक संकल्प होता है... अपने बच्चों के लिए दाना जुटाना। पर जैसे ही सांझ उतरती है, आकाश पर लौटते पंछियों की कतारें बनती हैं, वह भी अपने घोंसले की ओर लौट पड़ती है... अपनी नन्ही संतानों के पास, अपने घर, अपने अपनापन के पास।

शायद मनुष्य भी कुछ ऐसा ही है... बस अंतर इतना है कि चिड़िया हर शाम लौट आती है, और मनुष्य लौटने की इच्छा को वर्षों तक अपने भीतर दबाए जीता रहता है।

हम भी तो अपने गाँव, अपने घर, अपनी जन्मभूमि, अपने माँ-बाबूजी, भाई-बहनों, बचपन के दोस्तों को छोड़कर निकल पड़ते हैं... किसी दूसरे शहर, किसी अनजान दुनिया में... केवल इस आशा में कि आने वाली पीढ़ियों का भविष्य उज्ज्वल हो। दिन भर काम की दौड़, जिम्मेदारियों का बोझ, और रात को थके हुए मन में अचानक किसी पुराने आँगन की याद उतर आती है। मिट्टी की वह सोंधी महक, खेतों में लहराती हरी फसलें, तालाब के शांत पानी पर डूबता सूरज, नीम और पीपल की ठंडी छाँव... सब स्मृतियों में आकर मन को भिगो जाते हैं।

याद आता है वह बचपन, जब स्वच्छ चाँदनी रातों में आँगन में सबके बिस्तर बिछते थे। दादा जी आसमान के तारों को दिखाकर कहानियाँ सुनाते थे। दादी माँ की गोद में सिर रखते ही जैसे सारी दुनिया का भय समाप्त हो जाता था। नाना-नानी के किस्सों में राजकुमार होते थे, परियों के महल होते थे, और हम उन कहानियों में खोकर कब नींद की बाहों में चले जाते थे, पता ही नहीं चलता था।

आज बड़े शहरों की ऊँची इमारतों में खिड़की से झाँकता हूँ तो आकाश भी अधूरा लगता है। वहाँ चाँद तो है, पर वैसी आत्मीयता नहीं। हवा तो है, पर उसमें अपनी मिट्टी की खुशबू नहीं। लोग तो हैं, पर अपनेपन की वह गर्माहट नहीं। यहाँ जीवन चलता तो है... पर कई बार लगता है जैसे हम जी नहीं रहे, बस निभा रहे हैं।

कभी-कभी मन बहुत प्यासा हो उठता है... उस आवाज़ के लिए, जो माँ रसोई से पुकारती थी। उस स्पर्श के लिए, जिसमें बाबूजी का मौन स्नेह छुपा होता था। उस हँसी के लिए, जो भाइयों के साथ बेवजह गूँजती थी। उन दोस्तों के लिए, जिनके साथ नंगे पाँव खेतों की मेड़ों पर दौड़ना ही सबसे बड़ा सुख था।

जीवन सचमुच एक खानाबदोश यात्रा जैसा लगता है। हम कहाँ से निकले थे... कहाँ पहुँचना था... और कहाँ भटक गए... यह किसी को नहीं मालूम। बस चलते जाते हैं, जिम्मेदारियों की गठरी कंधों पर उठाए हुए। और फिर एक दिन खबर आती है... कोई लौट आया... लेकिन अपने पैरों से नहीं... चार कंधों पर।

यह सोचकर हृदय काँप उठता है... क्या सचमुच मनुष्य अपनी जन्मभूमि में लौटता ही तब है, जब उसकी साँसें साथ छोड़ चुकी होती हैं? नहीं... मन कहता है, इससे पहले लौटना चाहिए। एक बार फिर उस मिट्टी को माथे से लगाना चाहिए, जहाँ पहला कदम रखा था। उस नीम के पेड़ को छूना चाहिए, जिसने बचपन की धूप से बचाया था। उस तालाब के किनारे बैठना चाहिए, जहाँ सपने पहली बार पानी में अपना चेहरा देखते थे। उस आँगन में फिर लेटना चाहिए, जहाँ चाँदनी बिना बुलाए उतर आती थी।

एक दिन मुझे भी लौट आना है... अपनी मिट्टी में... अपने दादा-दादी की स्मृतियों की गोद में... अपने नन्हे दोस्तों की हँसी के पास... उस गाँव की पगडंडियों पर, जहाँ मेरा बचपन अब भी शायद मेरा इंतज़ार कर रहा है। क्योंकि अंत में मनुष्य कहीं और का नहीं होता... वह अपनी मिट्टी का ही होता है... हमेशा...।

प्रेम जो जोड़ता है, तोड़ता नहीं 💕

वह रात जो लौटकर न आई 💕


मेरी बेटियाँ... मेरे घर की धड़कनें 💕

गर्मियों की छुट्टियाँ आते ही घर का रंग कुछ बदल जाता है। बच्चों की आँखों में नानी के घर जाने की चमक उतर आती है। मामा-मामी, गाँव क...