गर्मियों की छुट्टियाँ आते ही घर का रंग कुछ बदल जाता है। बच्चों की आँखों में नानी के घर जाने की चमक उतर आती है। मामा-मामी, गाँव की गलियाँ, आम के पेड़, नानी के हाथ का खाना... इन सबका आकर्षण उन्हें अपनी ओर खींच लेता है। पत्नी भी कुछ दिनों के लिए अपने माँ-पापा, भाई-भाभी और अपनों से मिलने चली जाती है। यह स्वाभाविक है... होना भी चाहिए। पर उनके जाने के बाद इस घर में जो सन्नाटा उतरता है, उसे शब्दों में कहना आसान नहीं।
मैं यहाँ रायपुर में अकेला रह जाता हूँ... पर सच कहूँ तो मेरा मन भी वहीं उनके पास ही भटकता रहता है। मेरा घर तो मेरी दोनों बेटियों की हँसी से आबाद रहता है। उनकी मीठी बातें पूरे दिन घर-आँगन में ऐसे गूँजती रहती हैं, जैसे किसी मंदिर में सुबह की घंटियाँ। शाम को जब ऑफिस से लौटता हूँ, तो दरवाज़े पर दो जोड़ी चमकती आँखें मेरा इंतज़ार करती मिलती हैं। उन आँखों में कितनी उम्मीदें होती हैं... पापा आज क्या लाए होंगे... चॉकलेट... कुरकुरे... चिप्स... या हमारी पसंद की कोई छोटी-सी चीज़...और मैं हर दिन उनके उस इंतज़ार में अपना संसार देखता हूँ।
मेरी बेटियाँ कुछ अलग हैं... बहुत अलग। वे केवल मेरी बेटियाँ नहीं, मेरे दिन भर की थकान का मरहम हैं। कभी मैं थका-हारा बैठा होता हूँ, तो उनके छोटे-छोटे, कोमल हाथ मेरे सिर पर आ जाते हैं। वे अपने नन्हे हाथों से जैसे कोई जादू करती हैं... धीरे-धीरे सिर दबाती हैं, और फिर प्यार से मेरा माथा चूम लेती हैं। उस एक क्षण में दिन भर की सारी थकान जाने कहाँ खो जाती है।
कभी पूछती हैं... "पापा, दवाई खा ली क्या?"
"पापा, तबियत अब ठीक है न?" उनकी यह चिंता देखकर मन भीतर तक भीग जाता है। सोचता हूँ... ये छोटी-सी जानें इतना स्नेह कहाँ से ले आती हैं?
दिन भर घर में उनका अपना एक अलग संसार चलता है। कभी नाचना, कभी गुनगुनाना, कभी कपड़े बदल-बदलकर आईने के सामने इठलाना, कभी खुद को राजकुमारी समझना, कभी माँ की चूड़ियाँ पहन लेना... और फिर खिलखिलाकर हँस देना।
मेरी बड़ी बिटिया चित्रा अब 9वीं कक्षा में है, बहुत समझदार, बहुत गंभीर, हमेशा मर्यादित, भावनाओं की गहराई को समझने वाली... छोटी बिटिया आराध्या अपने नाम की तरह ही पूजा-सी निर्मल, थोड़ी शरारती, थोड़ी जिद्दी। दोनों के बीच छोटी-छोटी लड़ाइयाँ भी होती हैं... कभी खिलौने को लेकर, कभी रिमोट को लेकर, कभी बिना वजह ही। फिर उनकी मम्मी वर्षा बीच में आती हैं... प्यार से समझाती हैं, कभी डाँटती हैं, कभी खुद हँस पड़ती हैं। और मैं... मैं चुपचाप यह सब देखता रहता हूँ।
हाँ... मैं चुपके से सब देखता हूँ। उन्हें हर दिन थोड़ा-थोड़ा बड़ा होते देखता हूँ। उनकी बदलती बातें, बदलती पसंद, उनकी बढ़ती समझ... सब देखता हूँ। और हर दिन भीतर कहीं एक अजीब-सी कसक भी उठती है... कि ये नन्हे पल कितनी जल्दी बीत जाएँगे। कभी-कभी रात को लगता है, जीवन में यदि कुछ सचमुच ईश्वर का दिया हुआ सबसे सुंदर उपहार है, तो वह बच्चों की हँसी है। माता-पिता होना केवल जिम्मेदारी नहीं... यह तो ईश्वर द्वारा सौंपा गया प्रेम का सबसे पवित्र रूप है।
आज जब वे घर में नहीं हैं, तो यह मकान सिर्फ दीवारों का ढाँचा लगता है। न वह शोर है, न वह खिलखिलाहट, न वह "पापा आ गए" की पुकार और तब समझ आता है... घर ईंट-पत्थरों से नहीं बनता... घर उन नन्हे कदमों की आहट से बनता है, उन छोटी हथेलियों के स्पर्श से बनता है, पत्नी के मौन स्नेह से बनता है।