बुधवार, 24 जून 2026

अनंत की खोज...💐💐💐


जीवन क्या है... यह प्रश्न जितना पुराना है, उतना ही नया भी। मनुष्य जन्म लेता है, बढ़ता है, सपने देखता है, प्रेम करता है, संघर्ष करता है और एक दिन इस संसार से चला जाता है। इस छोटी सी यात्रा में वह न जाने कितनी चीजों को अपना मान लेता है। यह मेरा घर है, मेरा परिवार है, मेरा धन है, मेरी पहचान है। लेकिन समय धीरे धीरे उसके हाथों से सब कुछ छीन लेता है और अंत में वह खाली हाथ ही चला जाता है।

तब मन में एक प्रश्न उठता है, यदि सब कुछ यहीं छूट जाना है, तो वास्तव में हमारा है क्या?
संतों और ऋषियों ने कहा कि यह संसार एक स्वप्न के समान है। जो आज सत्य प्रतीत होता है, वह कल स्मृति बन जाता है। जो आज अपना लगता है, वह कल पराया हो जाता है। यह जगत परिवर्तनशील है, इसलिए इसे अंतिम सत्य नहीं कहा जा सकता। पर इसका अर्थ यह भी नहीं कि जीवन निरर्थक है। यदि संसार क्षणभंगुर है, तो इसी क्षणभंगुरता के भीतर किसी शाश्वत तत्व की खोज करना ही मनुष्य जीवन का उद्देश्य है।

क्या वह अत्यंत सुंदर होगा, क्या वह भयंकर डरावना होगा अथवा हमारी कल्पनाओं से भी परे होगा? इन प्रश्नों का उत्तर किसी पुस्तक में नहीं मिलता। उत्तर केवल अनुभव में मिलता है। यही कारण है कि सच्चा साधक केवल मान्यताओं से संतुष्ट नहीं होता। वह जानना चाहता है। वह देखना चाहता है। वह अनुभव करना चाहता है। उसके भीतर एक प्यास जन्म लेती है। यह प्यास धन की नहीं होती, सम्मान की नहीं होती, बल्कि सत्य की होती है।

ध्यान उसी प्यास का नाम है। सुमिरन उसी पुकार का नाम है। प्रार्थना उसी प्रेम का नाम है। जब मनुष्य कुछ क्षणों के लिए संसार के शोर से दूर होकर अपने भीतर उतरता है, तब उसे अनुभव होने लगता है कि जिस परमात्मा को वह बाहर खोज रहा था, उसकी झलक तो भीतर भी मौजूद है। मन की गहराइयों में एक मौन है। उस मौन में एक अदृश्य उपस्थिति है। वही उपस्थिति जीवन को धारण किए हुए है।

परमात्मा की खोज किसी स्थान की यात्रा नहीं है यह भीतर की यात्रा है। यह यात्रा अनंत की ओर है। यह यात्रा स्वयं को खोकर स्वयं को पाने की यात्रा है। जैसे नदी समुद्र की ओर बहती है, वैसे ही आत्मा भी अपने स्रोत की ओर लौटना चाहती है। इसी कारण संसार की सभी उपलब्धियों के बाद भी मनुष्य के भीतर एक रिक्तता बनी रहती है। धन मिल जाता है, परिवार मिल जाता है, प्रेम मिल जाता है, सम्मान मिल जाता है, फिर भी कहीं न कहीं लगता है कि कुछ अभी शेष है।
वह जो शेष है, वही परमात्मा की पुकार है।
वही अनंत की स्मृति है।

वही उस मूल घर की याद है, जहाँ से हम आए हैं।
यदि परमात्मा ने हमें चेतना दी है, विवेक दिया है, प्रश्न करने की क्षमता दी है, तो निश्चय ही उसने हमें खोज के लिए ही भेजा है। केवल जन्म लेना, भोजन करना, संघर्ष करना और एक दिन आँखें बंद कर लेना ही मनुष्य जीवन का उद्देश्य नहीं हो सकता।

मनुष्य का वास्तविक सौभाग्य तब आरंभ होता है, जब उसके भीतर यह प्रश्न जागता है:-
मैं कौन हूँ?
मैं कहाँ से आया हूँ?
और मुझे कहाँ लौटना है?
जिस दिन यह प्रश्न हृदय में अग्नि बनकर जलने लगते हैं, उसी दिन आध्यात्मिक यात्रा आरंभ हो जाती है।

✍️ Lekhraj Sahu ❤️

गुरुवार, 11 जून 2026

पहला प्यार 💕

सब्ज़ियों की एक छोटी सी बाड़ी थीवहीं मिट्टी की सोंधी खुशबू, हरी पत्तियों की सरसराहट और धड़कते हुए दिलों के बीच उसने मुझे बुलाया था और एक प्रेम पत्र दिया था। उस पल में जैसे पूरा संसार ठहर गया था। शब्द तो उस कागज़ पर लिखे थे, लेकिन उन्हें पढ़ने से पहले ही उसकी झुकी हुई नज़रें और काँपती हुई मुस्कान सब कुछ कह चुकी थीं।

फिर एक ऐसा क्षण आया, जो समय की धूल में दबकर भी कभी धुंधला नहीं पड़ा। उसने धीरे से मेरे गाल पर एक चुंबन किया और अपने घर की ओर भाग गई, और वह पल मेरी स्मृतियों में हमेशा के लिए ठहर गया। उस उम्र में वह क्षण किसी अनमोल ख़ज़ाने से कम नहीं था। धड़कनें तेज़ हो गई थीं, शब्द जैसे कहीं खो गए थे, और मन एक अजीब सी खुशी से भर उठा था।

उसके घर के पास एक तालाब था। तालाब के पानी पर पुरइन के गोल, चौड़े हरे पत्ते तैरते रहते थे और उनके बीच खिले गुलाबी कमल के फूल मानो किसी प्रेम कहानी के मौन साक्षी हों। सुबह की पहली किरण जब उन कमलों पर पड़ती थी, तो पूरा तालाब सोने सा चमक उठता था। शाम को ढलते सूरज की लालिमा उन पुरइन के पत्तों और कमल के फूलों पर बिखर जाती थी, और ऐसा लगता था मानो प्रकृति स्वयं प्रेम का कोई गीत गुनगुना रही हो।

तालाब के किनारे खड़े नीम और पीपल के पेड़ अपनी घनी छाँव फैलाए रहते थे। उनकी पत्तियों से गुजरती हवा में एक अजीब सी मिठास थी। उन्हीं रास्तों पर चलते हुए, उन्हीं पेड़ों की छाँव में खड़े होकर, न जाने कितनी बार मैंने उसकी एक झलक पाने की प्रतीक्षा की थी।

आज इतने वर्षों बाद भी जब उस बाड़ी, उस तालाब, पुरइन के पत्तों, गुलाबी कमलों, नीम और पीपल की छाँव को याद करता हूँ, तो वह मासूम सा प्रेम भी यादों के आँगन में उतर आता है। लगता है जैसे समय बहुत आगे बढ़ गया हो, पर मन का एक कोना अब भी वहीं ठहरा हुआ है... उसी प्रेम पत्र के पास... उसी मुस्कान के पास... और उसी पहले चुंबन के पास।

कुछ प्रेम कहानियाँ पूरी नहीं होतीं, फिर भी अधूरी नहीं कहलातीं। वे जीवन के किसी शांत तालाब में खिले कमल की तरह होती हैं... जिनकी सुंदरता समय बीत जाने के बाद भी स्मृतियों के जल में सदा खिली रहती है।

✍️ Lekhraj Sahu ❤️

अनंत की खोज...💐💐💐

जीवन क्या है... यह प्रश्न जितना पुराना है, उतना ही नया भी। मनुष्य जन्म लेता है, बढ़ता है, सपने देखता है, प्रेम करता है, संघर्ष क...