शुक्रवार, 22 मई 2026

एक दिन लौट आना है अपनी मिट्टी में...💕

चिड़िया को देखता हूँ तो लगता है, प्रकृति ने जीवन का सबसे बड़ा सत्य उसके छोटे से हृदय में छुपा रखा है। वह सुबह अपने घोंसले से उड़ जाती है... न उसे कड़ी धूप की परवाह होती है, न बरसते बादलों की, न मीलों की दूरियों का भय। उसकी छोटी-सी चोंच में केवल एक संकल्प होता है... अपने बच्चों के लिए दाना जुटाना। पर जैसे ही सांझ उतरती है, आकाश पर लौटते पंछियों की कतारें बनती हैं, वह भी अपने घोंसले की ओर लौट पड़ती है... अपनी नन्ही संतानों के पास, अपने घर, अपने अपनापन के पास।

शायद मनुष्य भी कुछ ऐसा ही है... बस अंतर इतना है कि चिड़िया हर शाम लौट आती है, और मनुष्य लौटने की इच्छा को वर्षों तक अपने भीतर दबाए जीता रहता है।

हम भी तो अपने गाँव, अपने घर, अपनी जन्मभूमि, अपने माँ-बाबूजी, भाई-बहनों, बचपन के दोस्तों को छोड़कर निकल पड़ते हैं... किसी दूसरे शहर, किसी अनजान दुनिया में... केवल इस आशा में कि आने वाली पीढ़ियों का भविष्य उज्ज्वल हो। दिन भर काम की दौड़, जिम्मेदारियों का बोझ, और रात को थके हुए मन में अचानक किसी पुराने आँगन की याद उतर आती है। मिट्टी की वह सोंधी महक, खेतों में लहराती हरी फसलें, तालाब के शांत पानी पर डूबता सूरज, नीम और पीपल की ठंडी छाँव... सब स्मृतियों में आकर मन को भिगो जाते हैं।

याद आता है वह बचपन, जब स्वच्छ चाँदनी रातों में आँगन में सबके बिस्तर बिछते थे। दादा जी आसमान के तारों को दिखाकर कहानियाँ सुनाते थे। दादी माँ की गोद में सिर रखते ही जैसे सारी दुनिया का भय समाप्त हो जाता था। नाना-नानी के किस्सों में राजकुमार होते थे, परियों के महल होते थे, और हम उन कहानियों में खोकर कब नींद की बाहों में चले जाते थे, पता ही नहीं चलता था।

आज बड़े शहरों की ऊँची इमारतों में खिड़की से झाँकता हूँ तो आकाश भी अधूरा लगता है। वहाँ चाँद तो है, पर वैसी आत्मीयता नहीं। हवा तो है, पर उसमें अपनी मिट्टी की खुशबू नहीं। लोग तो हैं, पर अपनेपन की वह गर्माहट नहीं। यहाँ जीवन चलता तो है... पर कई बार लगता है जैसे हम जी नहीं रहे, बस निभा रहे हैं।

कभी-कभी मन बहुत प्यासा हो उठता है... उस आवाज़ के लिए, जो माँ रसोई से पुकारती थी। उस स्पर्श के लिए, जिसमें बाबूजी का मौन स्नेह छुपा होता था। उस हँसी के लिए, जो भाइयों के साथ बेवजह गूँजती थी। उन दोस्तों के लिए, जिनके साथ नंगे पाँव खेतों की मेड़ों पर दौड़ना ही सबसे बड़ा सुख था।

जीवन सचमुच एक खानाबदोश यात्रा जैसा लगता है। हम कहाँ से निकले थे... कहाँ पहुँचना था... और कहाँ भटक गए... यह किसी को नहीं मालूम। बस चलते जाते हैं, जिम्मेदारियों की गठरी कंधों पर उठाए हुए। और फिर एक दिन खबर आती है... कोई लौट आया... लेकिन अपने पैरों से नहीं... चार कंधों पर।

यह सोचकर हृदय काँप उठता है... क्या सचमुच मनुष्य अपनी जन्मभूमि में लौटता ही तब है, जब उसकी साँसें साथ छोड़ चुकी होती हैं? नहीं... मन कहता है, इससे पहले लौटना चाहिए। एक बार फिर उस मिट्टी को माथे से लगाना चाहिए, जहाँ पहला कदम रखा था। उस नीम के पेड़ को छूना चाहिए, जिसने बचपन की धूप से बचाया था। उस तालाब के किनारे बैठना चाहिए, जहाँ सपने पहली बार पानी में अपना चेहरा देखते थे। उस आँगन में फिर लेटना चाहिए, जहाँ चाँदनी बिना बुलाए उतर आती थी।

एक दिन मुझे भी लौट आना है... अपनी मिट्टी में... अपने दादा-दादी की स्मृतियों की गोद में... अपने नन्हे दोस्तों की हँसी के पास... उस गाँव की पगडंडियों पर, जहाँ मेरा बचपन अब भी शायद मेरा इंतज़ार कर रहा है। क्योंकि अंत में मनुष्य कहीं और का नहीं होता... वह अपनी मिट्टी का ही होता है... हमेशा...।

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