गुरुवार, 20 जून 2019

दुविधा...💐

चूंकि साहब फेसबुक पर हैं, और वो सबको पढ़ते भी हैं। हर किसी की खबर रखते हैं। उनके सामने किसी भी विषय पर कुछ कहने या लिखने में बड़ी घबराहट होती है, डर लगता है। जो खुद ज्ञान हैं, ध्यान हैं, प्रेम हैं, मुक्ति हैं, सर्वोच्च सत्ता हैं, उनके सामने भला क्या कहें और किस भाँति कहें?

जिंदगी उन्हीं के इर्द गिर्द घूमती है, इसलिए लिखने के लिए उनके अलावा कोई और विषय भी नहीं सूझता। बड़ी दुविधा है।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

स्वयं का बोध 💐💐💐

स्वयं का बोध: - जीवन बाहरी उपलब्धियों की दौड़ नहीं, बल्कि अपने अंतर्मन की खोज है। हम अक्सर दुनिया के शोर में खो जाते हैं, जबकि असली सत्य हमा...