शनिवार, 29 जून 2019

आदर्श गृहस्थी...💐

एक संत कहा करते थे कि हम गृहस्थों के लिए साहब और वंश ब्यालिश दामाखेड़ा का गृहस्थ जीवन ही आदर्श है। हमें उनका अनुकरण करते हुए इस भव सागर से पार जाना है, बंधनों से मुक्त हो जाना है। वो हमारे परमात्मा हैं, उनके आश्रय में जीवन जीना है, उनकी छाया में सांस लेना है, फलना-फूलना और खाक हो जाना है। उनका जीवन हम गृहस्थों के लिए प्रेरणास्रोत है।

ऐसा कहने वाले संत विरले ही होते हैं, साहब के आश्रय में अपना जीवन खाक करने वाले विरले ही होते हैं। जब हम पति-पत्नी संतों के ऐसे वचन सुनते हैं तो दुखी हो जाते हैं। लगता है हम कहीं भटके हुए हैं, कहीं रुके हुए हैं, हमारा जीवन उस ओर नहीं जा रहा जिस ओर जाने की कामना करते हैं।

साहब और उनका गृहस्थ जीवन दिव्य होता है, उनमें परम् सत्ता का अंश होता है, वो खास उद्देश्य के लिए धरती पर अवतरित होते हैं। उनके धरती पर अवतरण का उद्देश्य ही जीव जगत का उद्धार होता है।

जबकि हमारा जीवन, हमारी गृहस्थी तो कीचड़ में सना हुआ है। थोड़ी दूर उनकी ओर बढ़ते हैं, उनकी ओर चलते हैं, फिर रुक जाते हैं। बार बार गिरते हैं, बार बार उठते हैं, फिर गिरते हैं...। यह क्रम सालों से चला आ रहा है। लेकिन जिंदगी वहीं की वहीं है।

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