जीवन का एक बड़ा सत्य यह है कि समय के साथ मनुष्य का मोह धीरे धीरे टूटने लगता है। बचपन में जिन खिलौनों के बिना जीवन अधूरा लगता था, बड़े होने पर वे कहीं खो जाते हैं और उनकी याद भी नहीं रहती। फिर नए सपने आते हैं, नई इच्छाएँ आती हैं, और मन उन्हीं में उलझ जाता है।
युवावस्था में मन रिश्तों में अर्थ खोजता है। प्रेम में सुख खोजता है। परिवार में अपना संसार देखता है। धन कमाने में अपनी सफलता देखता है। लगता है कि यही सब जीवन का आधार है। इन्हीं के लिए मनुष्य दिन रात भागता है, संघर्ष करता है, सपने बुनता है।
धीरे धीरे जीवन मनुष्य को सिखाता है कि संसार की हर वस्तु परिवर्तनशील है। लोग बदलते हैं। परिस्थितियाँ बदलती हैं। रिश्तों की गर्माहट भी समय के साथ बदल जाती है। जिन लोगों के बिना कभी एक दिन बिताना कठिन लगता था, उन्हीं से कभी कभी महीनों बात नहीं होती। जिन वस्तुओं को पाने के लिए जीवन भर परिश्रम किया, एक समय के बाद वे भी साधारण लगने लगती हैं।
धन आवश्यक है, लेकिन एक सीमा के बाद वह मन की प्यास नहीं बुझा पाता। सम्मान अच्छा लगता है, लेकिन वह भी स्थायी संतोष नहीं दे पाता। परिवार जीवन का आधार है, लेकिन वहाँ भी सब कुछ हमेशा वैसा नहीं रहता जैसा हम चाहते हैं।
धीरे धीरे मनुष्य समझने लगता है कि वह जिन चीजों को स्थायी मान रहा था, वे सब अस्थायी हैं।
यह समझ कभी एक दिन में नहीं आती। यह अनुभवों से आती है। सुख और दुःख दोनों से आती है। बिछड़नों से आती है। उम्र के बढ़ते कदमों के साथ आती है। फिर एक समय ऐसा आता है जब मन भीतर की ओर देखने लगता है। उसे महसूस होता है कि जिन चीजों को वह जीवन भर पकड़कर रखना चाहता था, वे सब हाथों से फिसलती चली जा रही हैं। तब उसके भीतर एक नई खोज जन्म लेती है।
वह खोज किसी व्यक्ति की नहीं होती। वह खोज किसी धन या पद की नहीं होती। वह खोज शांति की होती है। वह खोज स्वयं को समझने की होती है। तब मनुष्य को लगता है कि शायद जीवन का उद्देश्य केवल संग्रह करना नहीं था। केवल रिश्ते बनाना नहीं था। केवल नाम और पहचान कमाना नहीं था। इन सबके पीछे कोई और गहरा अर्थ छिपा हुआ है। मोहभंग का अर्थ यह नहीं कि मनुष्य प्रेम करना छोड़ दे या परिवार से दूर हो जाए। इसका अर्थ केवल इतना है कि वह इन सबको उनके वास्तविक स्वरूप में देखना सीख जाए। वह समझ जाए कि सब कुछ अनमोल है, लेकिन सब कुछ क्षणभंगुर भी है। जब यह समझ आती है, तब मन में एक नई शांति जन्म लेती है। अपेक्षाएँ कम होने लगती हैं। शिकायतें घटने लगती हैं। और जीवन पहले से अधिक सरल लगने लगता है। शायद यही परिपक्वता है।
शायद यही जीवन का वह मोड़ है, जहाँ मनुष्य संसार में रहते हुए भी उससे थोड़ा ऊपर उठने लगता है। और तब उसे समझ में आता है कि जीवन का सबसे बड़ा सहारा न धन है, न पद है, न प्रसिद्धि है।
सबसे बड़ा सहारा वह आंतरिक शांति है, जो तब जन्म लेती है जब मोह धीरे धीरे कम होने लगता है और मन सत्य के निकट पहुँचने लगता है। जितनी जल्दी इस जगत से मोहभंग हो जाए उतना ही अच्छा है।
✍️ Lekhraj Sahu
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