कुछ प्रेम कहानियाँ पूरी होकर भी अधूरी रह जाती हैं, और कुछ अधूरी होकर भी जीवन भर पूरी लगती हैं। मेरा प्यार भी कुछ ऐसा ही था, न पूरी तरह मेरा, न पूरी तरह मुझसे दूर। वह जैसे किसी संध्या की आख़िरी किरण थी, जो आँखों से ओझल हो जाती है, पर मन के आकाश में देर तक चमकती रहती है।
वह मेरे जीवन में ऐसे आई थी जैसे सूखी धरती पर पहली बारिश की खुशबू उतरती है। बिना शोर, बिना घोषणा, बस चुपचाप। उसके आने से मेरे भीतर का सूना आँगन बोलने लगा था। हवा में एक नई मिठास थी, रास्ते छोटे लगने लगे थे, और इंतज़ार भी किसी उत्सव जैसा लगने लगा था।
प्रेम में सबसे सुंदर बात यह नहीं होती कि कोई आपके साथ है, सबसे सुंदर यह होता है कि किसी के होने से आप अपने भीतर बेहतर हो जाते हैं। उसके साथ मैं खुद को अधिक सच्चा, अधिक कोमल, अधिक जीवित महसूस करता था। उसकी हँसी मेरे दिन की शुरुआत थी और उसकी खामोशी मेरे मन की बेचैनी।
लेकिन शायद हर कहानी को मंज़िल नहीं मिलती। कुछ रिश्ते समय के हाथों छूट जाते हैं, कुछ परिस्थितियों के सामने हार जाते हैं, और कुछ लोग एक दूसरे से प्रेम करते हुए भी एक दूसरे के नहीं हो पाते।
मेरा अधूरा प्यार कोई शिकायत नहीं है। वह एक ऐसी प्रार्थना है जो पूरी न होकर भी पवित्र है। उसने मुझे टूटना सिखाया, और टूटकर भी प्रेम करना सिखाया। उसने यह समझाया कि प्रेम हमेशा पाने का नाम नहीं होता; कभी कभी प्रेम छोड़ देने में भी उतना ही सच्चा होता है।
आज भी जब किसी शाम हवा में मिट्टी की खुशबू आती है, जब कोई पुराना गीत अनायास कानों में उतरता है, या जब चाँद कुछ ज्यादा उदास लगता है, तो उसका ख़याल चुपचाप मेरे पास आ बैठता है। अब दर्द पहले जैसा तीखा नहीं रहा, लेकिन उसकी स्मृति एक धीमी आँच की तरह अब भी भीतर जलती है।
अधूरा प्रेम शायद इसलिए इतना गहरा होता है क्योंकि उसमें “क्या होता अगर…” का एक अनंत प्रश्न छिपा रहता है। जो मिल जाता है, वह जीवन का हिस्सा बन जाता है; जो नहीं मिलता, वह आत्मा का हिस्सा बन जाता है।
मेरा अधूरा प्यार अब मेरी कमी नहीं, मेरी संवेदना है। वह मेरे भीतर एक शांत नदी की तरह बहता है, बिना शोर, बिना मांग, बस अस्तित्व के साथ।
शायद कुछ प्रेम कहानियाँ साथ चलने के लिए नहीं, भीतर हमेशा जीवित रहने के लिए होती हैं।
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