चाहतों के बादल बरसने लगे हैं, कामनाओं की झड़ी लगी हुई है। इन्हें सही दिशा दे लूँ, सुरति को संवार लूँ, नाम के चादर में अस्तित्व ढंक लूँ, समा लूँ। जी चाहता है विराम लूँ।
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साहब कबीर की परंपरा में गुरु केवल मार्गदर्शक नहीं होते, वे साधना, मर्यादा और चेतना की अखंड परंपरा के संवाहक होते हैं। चादर तिलक का यह अवसर इ...
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