गुरुवार, 22 अगस्त 2019

स्वतः संस्कार...

पत्नी रोज शाम होते ही अगरबत्ती जलाकर संध्यापाठ के शब्दों को दुहराती रहती है। विगत दस बरसों से रोज नित्य रूप से यही क्रिया अनवरत जारी है। उसे कुछ समझ आए या न आए लेकिन प्रतिदिन हर हाल में किसी कठोर व्रत की तरह नियमपूर्वक संध्यापाठ और आरती करती ही है।

बड़े लंबे समय से उसके इस नियम का घोर विरोधी रहा हूं। लेकिन एक दिन देखा की मेरे दोनों बच्चे भी संध्या पाठ और आरती में शामिल हो रहे हैं, ग्रंथों को आदर दे रहे हैं, सहजता से संस्कारित हो रहे हैं, स्वतः ही दीक्षित हो रहे हैं। तब से पत्नी के इस कठोर नियम का मैं भी समर्थक हो गया।

लेकिन बड़े दुख की बात है कि पिछले दस बरसों से मेरी गाड़ी संध्यापाठ के पहले पन्ने से ही आगे नहीं बढ़ सकी है।

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