रविवार, 16 फ़रवरी 2025

मेरी तन्हाई 💐💐💐

तन्हाई केवल एक एहसास नहीं, बल्कि एक ऐसी गहरी दुनिया है जहाँ कोई और नहीं, बस आप और आपकी सोच होती है। यह एक खाली कमरा नहीं, बल्कि एक भरी हुई किताब है, जिसमें यादों, अनुभवों और अनकही बातों के पन्ने भरे होते हैं। तन्हाई कभी खुशी की चुप्पी होती है, तो कभी दर्द की चीख। कभी आत्म-विश्लेषण का मौका देती है, तो कभी हमें अपने अंदर की गहराइयों से मिलवाती है। यह एक ऐसा दर्पण है, जिसमें हम अपनी असली पहचान को देख सकते हैं—बिना किसी दिखावे, बिना किसी बनावटीपन के।

तन्हाई के दो रूप होते हैं—एक जो हमें खुद को समझने का अवसर देता है, और दूसरा जो हमें अंदर ही अंदर तोड़ने लगता है। जब हम स्वेच्छा से तन्हाई को अपनाते हैं, तो यह आत्म-साक्षात्कार और शांति का अनुभव कराती है। लेकिन जब तन्हाई जबरदस्ती हमारे जीवन में दाखिल होती है, तो यह एक बोझ बन जाती है, जो दिल और दिमाग को थका देती है। तन्हाई का सबसे बड़ा साथी हमारी यादें होती हैं। कभी वे मधुर होती हैं, जो हमें मुस्कुराने पर मजबूर कर देती हैं, तो कभी वे कड़वी होती हैं, जो आंखों में आंसू ले आती हैं। यह एक अदृश्य पुल की तरह होती हैं, जो हमें अतीत से जोड़ देती हैं, और हम उसी बीते हुए कल में खो जाते हैं।

अगर तन्हाई आपके जीवन का हिस्सा बन गई है, तो इससे डरने की बजाय इसे समझने की कोशिश करें। इसे अपना दुश्मन नहीं, बल्कि दोस्त बनाइए। यह समय है खुद को जानने का, अपने भीतर की आवाज़ को सुनने का और नए सपनों को आकार देने का। किताबें पढ़िए, संगीत सुनिए, लिखिए, और सबसे महत्वपूर्ण—अपने मन से बात कीजिए। तन्हाई का मतलब अकेलापन नहीं होता, यह आत्म अन्वेषण का एक रास्ता भी हो सकता है। अगर हम इसे सकारात्मक दृष्टि से देखें, तो यह हमें खुद से जोड़ सकती है, हमारी रचनात्मकता को निखार सकती है, और हमें एक मजबूत इंसान बना सकती है। तो अगली बार जब तन्हाई आपके दरवाजे पर दस्तक दे, उसे एक प्याले चाय के साथ बैठकर सुनिए। हो सकता है, वह आपको कुछ नया सिखाने आई हो।

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बुधवार, 5 फ़रवरी 2025

सदगुरू कबीर नवोदय यात्रा 💐💐

सद्गुरु कबीर नवोदय यात्रा एक आध्यात्मिक यात्रा है, जिसका उद्देश्य कबीर साहब के विचारों और शिक्षाओं का प्रचार-प्रसार करना है। यह यात्रा साहब कबीर के अनुयायियों और भक्तों द्वारा आयोजित की जाती है, विशेष रूप से पंथ श्री उदितमुनि नाम साहब के मार्गदर्शन में।

यात्रा का उद्देश्य:
1. साहब कबीर के संदेश का प्रसार – उनके भक्ति, ज्ञान, और समाज सुधार से जुड़े विचारों को जन-जन तक पहुँचाना।

2. आध्यात्मिक जागरूकता – लोगों को आडंबर, रूढ़ियों और भेदभाव से मुक्त होकर सच्चे आध्यात्मिक ज्ञान की ओर प्रेरित करना।

3. धर्म और मानवता का प्रचार – यह यात्रा जाति, धर्म, भाषा आदि के भेदभाव से परे मानवता के उत्थान का संदेश देती है।

4. कबीर साहब के पवित्र स्थलों का भ्रमण – यात्रा के दौरान साहब कबीर से जुड़े विभिन्न तीर्थ स्थलों पर दर्शन किए जाते हैं।

यात्रा की विशेषताएँ:
इसमें साहब कबीर की वाणी, भजन-कीर्तन, प्रवचन और सत्संग होते हैं।

यह यात्रा समय-समय पर विभिन्न राज्यों और धार्मिक स्थलों में आयोजित होती रहती है।

हाल ही में, 2025 के प्रयागराज कुंभ मेले में भी यह यात्रा आयोजित की गई थी।

इससे पहले, राजस्थान जैसे स्थानों में भी यह यात्रा हो चुकी है।

महत्व:
यह यात्रा न केवल कबीर साहब  के उपदेशों को जीवंत बनाए रखने का प्रयास करती है, बल्कि समाज में प्रेम, करुणा और समानता का संदेश भी फैलाती है। यह सभी लोगों को आध्यात्मिक उन्नति की ओर अग्रसर करने का एक माध्यम है।

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रविवार, 14 अप्रैल 2024

साधना काल 💕

सन 2007 की बात है, नवरात्रि चल रही थी। मैने किसी से सुना था की नवरात्रि में साधक की मनोकामनाएं पूर्ण होती है, साधनाएं सफल होती है।

मैने सोचा की क्यों न इस नवरात्रि पर साहब की साधना किया जाए। मैने अपनी दुकान और व्यवसाय को अपने सहयोगी को सुपुर्द कर दिया और अपने आप को घर के कमरे में बंद कर लिया। सिर्फ दो वक्त खाना खाने और नित्यक्रिया के लिए कमरे से बाहर निकलता था। किसी से कोई बात भी नहीं करता था। 

कमरे में साहब की अमृत कलश ग्रंथ पढ़ता था और नाम सुमिरन के साथ ध्यान करता। नौ दिन और नौ रातें जागता ही रहा। सबकुछ झोंक दिया। वो नौ दिन मेरी जिन्दगी बदलने वाला रहा। जब कमरे से बाहर निकला नयन भीगे हुए थे, दुनिया को देखने का मेरा नजरिया पूरी तरह बदल चुका था। 

कुछ ऐसा हुआ की हाथ पांव लडखड़ा रहे थे, खुशियों से आंखें गीली हो चुकी थी, साहब मेरे नयनों में समा चुके थे, सासों में महक रहे थे, उनकी लालिमा मुझे चहुंओर घेरे हुए थे, उन्हें अपने घर बैठे ही देख पा रहा था। परमात्मा की अनुभूति, उनका अहसास, उनकी दिव्यत्म छुअन मैंने पहली बार महसूस की। उस दिन से मैं उनका हो गया। साधना से मुझे मेरे अनेकों प्रश्नों के उत्तर मिले, लेकिन कुछ प्रश्न अनुत्तरित ही रह गए। जब कभी साहब प्रत्यक्ष मिलेंगे तो उनसे निवेदन करूंगा की वो मेरे अनुत्तरित प्रश्नों का जवाब दें।

पिया मिलन की यादें 💕

साहब की दो बातें 💕💕

पन्थ श्री हुजूर गृन्धमुनि नाम साहब कहते हैं:-

"धर्मदास साहब से हमने केवल दो ही बातें सीखी। पहली बात तो अपने सद्गुरु की आज्ञा पर तत्पर रहना और दूसरी बात अपने जीवन में जोर जोर कर फुट फुटकर रोना। ये दोनों बातें बड़ी कीमती होती है।"

उपरोक्त अनुकरणीय बातों में साहब की पहली बात तो मै बिल्कुल भी शिरोधार्य नहीं करता। साहब की कोई बात नही मानता, कोई आज्ञा नहीं मानता।

लेकिन जहाँ तक दूसरी बात है तो साहब की यह बात बिल्कुल मानता हूँ। खूब रोता हूँ, उनके लिए रोने के अलावा मुझे कुछ और नहीं सूझता है। मेरे नयन उनकी याद में सदैव झरते रहते हैं।


साहब का दर्द 💕

जब हम दर्द में होते हैं तो हमारी करूँण पुकार क्या साहब तक नहीं पहुँचती होगी? हमारी दर्द भरी पुकार साहब तक जरूर पहुँचती है। वो हमारी दुर्दशा देखकर सो भी नहीं पाते होंगे। जिस दिन हम उनके नाम की कंठी माला धारण करते हैं उसी दिन से हमारी तारी उनसे जुड़ जाती है। उसी दिन से वो हमारी सुध लेना शुरू कर देते हैं, उसी दिन से वो हमारे हो जाते हैं और हम उनके। 

हमारे दर्द में तो वो हर क्षण हमारे साथ होते हैं, कभी अपनी वाणीयों के रूप में, कभी चरणामृत तो कभी प्रसाद के रूप में और कभी किसी संत के रूप में। कभी प्रत्यक्ष तो कभी अप्रत्यक्ष रूप में। लेकिन उनके दर्द में उनके साथ कौन होता है? वो तो जग कल्याण के लिए ही हमारे बीच हैं, क्या हमारी चीख पुकार सुनकर उनके नेत्रों से अश्रु धारा नहीं बहती होगी? 

जब कभी उनकी जगह अपने आप को रखकर देखता हूँ तो पाता हूँ की साहब बेपनाह दर्द में हैं, साहब नितांत अकेले हैं। और हम यह समझकर पल्ला झाड़ लेते हैं की वो तो परमात्मा हैं, साहब हैं, उन्हें भला क्या दर्द, क्या पीड़ा...। 
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सोमवार, 31 जुलाई 2023

व्यवस्था सुधार की आवश्यकता

ये लेख मैं थोड़ा डर-डरकर लिख रहा हूँ, क्योंकि चली आ रही व्यवस्था पर कुछ लिखता हूँ तो मुझे किसी न किसी का आब्जेक्शनल फोन आ जाता है, किसी किसी का धमकी भरा फोन भी। कहते हैं चली आ रही व्यवस्था को, संतो को, सतगुरु को चुनौती देते हो, उनकी आलोचना करते हो, ग्रन्थों में लिखी वाणियों की अवहेलना करते हो। फिर भी मेरे मन के विचार लिख रहा हूँ। किसी को पीड़ा पहुचे तो क्षमाप्रार्थी हूँ।

मैं भु-दान और आश्रम व्यवस्था के खिलाफ हूँ। अगर कोई भक्त अपनी जमीन, खेत, घर आदि किसी संस्था, संत, आध्यात्मिक गुरूओं को दान करता है तो अधिकतर मामलों में उस गांव में आश्रम खोल दिया जाता है तथा व्यवस्था चलाने के लिए पुजारी, सेवक की नियुक्ति की जाती है। और यहीं से शुरू होता है अपराध और अनैतिक कर्मो का सिलसिला।

इसका हल मैं लम्बे समय से खोज रहा हूं की आश्रमों की अनैतिक और आपराधिक गतिविधियों पर कैसे रोक लगाई जाए। क्या आपके पास आश्रमों में होने वाले अपराधों और अनैतिक कर्मो को रोकने के लिए कोई सुझाव या हल है जो मेरी बुद्धि में उपजे सवालों को सुलझा सके?

शनिवार, 26 नवंबर 2022

आनंदी चौका आरती ...💐

कल दिनाँक 25 नवंबर 2022 को मेरे ससुराल ग्राम चिचोली, नांदघाट में आनंदी चौका आरती था। आदरनीय महंत दीपक साहब आए थे, उनसे मेरा हृदय का नाता बरसों से जुड़ा हुआ है। आंखें भाववश छलक उठीं।

मेरी तन्हाई 💐💐💐

तन्हाई केवल एक एहसास नहीं, बल्कि एक ऐसी गहरी दुनिया है जहाँ कोई और नहीं, बस आप और आपकी सोच होती है। यह एक खाली कमरा नहीं, बल्कि एक भरी हुई क...